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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 725, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 725

६७४ भावप्रकाशनिघण्टुः
यह समुद्री किनारों के जङ्गल एवं सड़कों के किनारे लगाया हुआ अधिक पाया जाता है।
इसका वृक्ष-मध्यमाकार का सदा हरा-भरा जल्दी बढ़ने वाला होता है। पत्ते-३-५ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च व्यास
के, पीपल के पत्तों के आकार वाले और पीपल से छोटे नोकवाले होते हैं। फूल-घण्टाकार, पाँच पंखडी वाले, पीले
एवं मुरझाने पर प्रायः गुलाबी रंग के होते हैं। फल-गूलर के समान परन्तु दृढ़ होता है। इसके अन्दर ४ बीज एरण्ड
के बीज की आकृति के होते हैं परन्तु बहुत बड़े। हरे फलों को चीरने से बहुत सा स्वर्णवर्ण का पीला दूध निकलता
है। फल सूखने पर हरापन छोड़ कर खाकी रंग के होकर चिटक जाते हैं परन्तु बीज अलग नहीं होते।
नोट-पारीष की गणना क्षीरी वृक्षों में की गई है इसलिये किसी-किसी वटजातीय (Ficus) वृक्ष को कुछ लोग
पारीष मानते हैं। इस दृष्टि से पीपल की तरह जिनके पत्ते होते हैं ऐसे फाइकस् आर्नोशियाना (F. arnottiana) एवं
फाइकस् रम्फाई (F. rumphii) को पारीष माना जा सकता है। थेस्पेसिया पोपुल्निया के छाल में यद्यपि क्षीर नहीं
होता तथापि उसके फल में होता है।
इसी छाल तथा पक्व फलों का उपयोग किया जाता है।
रासायनिक संगठन-पुष्पदल में पोुपुलिनिन (Populinin), पांपुलनेटिन (Popul-netin) एवं हर्बेसेटिन
(Herbecetin) ये द्रव्य पाये जाते हैं।
गुण और प्रयोग-इसके फलों की राख तेल में मिला कर खुजली, दाद आदि चर्मरोगों में लगाई जाती है एवं
इसकी छाल का क्वाथ पिलाते हैं।
मात्रा-त्वक् २-६ माशा।
अथ नन्दीवृक्षः (बेलिया पीपर) । तस्य नामगुणानाह
नन्दीवृक्षोऽश्वत्थभेदः प्ररोही गजपादपः । स्थालीवृक्षः क्षयतरुः क्षीरी च स्याद्वनस्पतिः ।।६।।
नन्दीवृक्षो लघुः स्वादुस्तिक्तस्तुवर उष्णकः । कटुपाकरसो ग्राही विषपित्तकफास्त्रजित् ।।७।।
बेलिया पीपर के संस्कृत नाम-नन्दीवृक्ष, अश्वत्थभेद, प्ररोही, गजपादप, स्थालीवृक्ष, क्षयतरु, क्षीरी और
वनस्पति ये सब हैं।
नन्दीवृक्ष-स्वादिष्ट, तिक्त तथा कषायरस युक्त, पाक में कटु रस युक्त, लघु, ग्राही, उष्ण, एवम् विष, पित्त, कफ
तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [६-७]
४. बेलिया पीपल
हिं०-बेलिया पीपल (र), कामरूप। बं०-कम्रुप। ते०-येर्जुवि। गु०-नांदरुखीवड़। म०-नन्दी वृक्ष,
नांद्रुक। ले०-Ficus retusa Linn. (फाइकस् रेटबुझा)। Fam. Moraceae (मोरेसी)।
यह छोटा नागपुर, बिहार, मध्यभारत, दक्षिण, लंका तथा सुन्दरवन में होता है।
इसका वृक्ष-साधारण ऊँचा होता है तथा प्ररोह अल्प या नहीं रहते। पत्ते-२ से ४ इञ्च लम्बे एवं करीब उतने
ही चौड़े, कुछ अंडाकार, चमकीले एवं छोटे से युक्त होते हैं। फल-अंडाकार होते हैं।
इसके पत्ते एवं छाल का उपयोग किया जाता है।
नोट-नन्दीवृक्ष का अभी तक निर्णय नहीं हुआ है। कुछ विद्वानों ने संभवतः इसके गुजराती नाम नाँदरूखीवड़
को आधार पर इसे नन्दी वृक्ष माना है।