भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पवर्गः ६६३
(५) ग्रन्थि, शोथ आदि में मूल का लेप, व्रण पर पंचांग सिद्ध तैल एवं बरसात में पैर न फटे इसलिये तलवे
पर पत्तों का लेप किया जाता है। कुष्ठादि चर्मरोगों में इसका लेप एवं आन्तरिक प्रयोग किया जाता है।
मात्रा-स्वरस १/२-१ तोला; क्वाथ ५-१० तो०।
अथ कुन्दम्। तस्य नामानि गुणाँश्चाह
कुन्दं तु कथितं माथ्यं सदापुष्पञ्च तत्स्मृतम्। कुन्दं शीतं लघु श्लेष्मशिरोरुग्विषपित्तहृत् ।।५४।।
कुन्द के संस्कृत नाम-कुन्द, माथ्य, सदापुष्प ये सब हैं। कुन्द-शीतल, लघु तथा कफ, शिरोरोग, विष और
पित्त को दूर करने वाला है। [५४]
२७. कुन्द
हिं०-कुन्द, कुन्दे का वृक्ष, कुन्द फूल। बं०-कुन्द। म०-कस्तूरी मोगरा। गु०-मोगरो। ता०-मल्लिगै।
ते०-कुंदमु। ले०-Jasminum pubescens Willd. (जसमीनम् प्युबेसेन्स) । Fam. Oleaceae (ओलिएसी)।
यह सब स्थानों पर होता है। बागों में शोभा के लिये भी लगाते हैं।
इसका गुल्म-बड़ा, रोमश, लतासदृश आरोहणशील होता है। पत्ते-विपरीत, ३.८-७ x १.६-३.८ से० मी०,
अंडाकार एवं लम्बाग्र तथा वृन्त ६-१० मि० मी० घन रोमश होता है। पुष्प-बेला के समान या उससे कुछ लम्बे,
गुच्छों में, श्वेत, सुगन्धित एवं दल पत्र आयताकार तथा मालाकार होते हैं। यद्यपि यह वर्ष भर फूलता है किन्तु शीत
ऋतु में बहुत अधिक फूलता है।
इसके पुष्प, पत्र एवं मूल का प्रयोग किया जाता है।
गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का पुल्टिस बनाकर पुराने व्रणों पर बाँधने से व्रणरोपण होने लगता है। इसकी जड़
सर्पविष में उपयोगी बतलाई गई है। पुष्प एवं पिप्पली को तण्डुलांबु के साथ श्वास में पिलाने से लाभ होता है। (सु०
उ० अ० ५१-३७)
अथ मुचुकुन्दः । (नाम्नैव प्रसिद्धः)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह
मुचुकुन्दः क्षत्रवृक्षश्चित्रकः प्रतिविष्णुकः । मुचुकुन्दः शिरःपीडापित्तास्रविषनाशनः ।। ५५ ।।
मुचुकुन्द (यह इसी नाम से प्रसिद्ध है) के संस्कृत नाम-मुचुकुन्द, क्षत्रवृक्ष, चित्रक, प्रतिविष्णुक, ये सब
हैं। मुचुकुन्द-शिर की पीड़ा, पित्त, रक्तविकार एवम् विष का नाशक है। [५५]
२८. मुचुकुन्द
हिं०, म०, बं०, गु०-मुचुकुन्द। ले०-Pterospermum acerifolium Willd. १ (टेरोस्पर्मम्
एसेरिफोलियम्) । Fam. Sterculiaceae (स्टर्क्यूलिएसी)।
यह हिमालय में ४००० फीट तक तथा बंगाल, चटगाँव, खासिया पहाड़, मणिपुर में तथा दक्षिण में विशेष रूप
से बम्बई प्रान्त में लगाया हुआ मिलता है।
१. "ग्रन्थों में भूल से एक दूसरी जाति P. suberifolium को मुचकुंद नाम दिया हुआ मिलता है।"-ठा. बलवन्तसिंह,
बिहार की वनस्पतियाँ, पृष्ठ १७। कुछ विद्वानों ने P. acerifolium को कर्णिकार माना है। कर्णिकार संभवतः आरग्वध
है। चरक में मुचकुंद का उल्लेख नहीं मिलता। सुश्रुत में विद्रधि अध्याय (चि. १८-१०) में है।