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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पुष्पवर्गः ६४५
४. कुमुद
हिं०-कुमुद, कमोदनी, कोई, कुईं । बं०-शालुक, सुन्दी । गु०-पोयण् । म०-कमोद । फा०-नीलूफर ।
अ०-अर्नबुलमा । अं०-Water lily (वाटर लिली) । ले०-Nymphaea alba Linn. (निम्फिआ अल्बा
लिन.) । Fam. Nymphaeaceae (निम्फिएसी) ।
यह काश्मीर में जलाशयों में पाया जाता है ।
इसका जलीय क्षुप बहु वर्षायु होता है । इसकी जड़ें जलाशय की सतह में फैलती हैं । पत्ते-गोल, हृदयाकार,
चमकीले तथा जल की सतह पर तैरते रहते हैं । पत्रनाल १० फुट तक लंबा होता है तथा पत्र फलक के मध्य में जुटा
रहता है । पुष्प-श्वेत तथा २-५ इञ्च व्यास में आते हैं । बाह्यदल-४, बाहर से कुछ हरिताभ तथा अन्दर से श्वेत होते
हैं । आभ्यंतर दल-करीब १० होते हैं जो अन्दर की तरफ पुंकेशर में बदल जाते हैं । फल-स्पंज सदृश होता है जो
जल के अन्दर पक्व होकर फट जाता है जिसमें से बीज बाहर निकल कर जल पर तैरते हैं । बीज-छोटे, कच्चे लाल
एवं पकने पर काले होते हैं । इन्हें भेंट या बेरा कहते हैं । बिहार और बंगाल में इनका लावा बनाकर उसके लड्डू बनाते
हैं । उनको वहाँ रामदाने के लड्डू कहते हैं ।
अन्य जातियाँ-
(१) Nymphaea rubra Roxb. (नि. रूब्रा) । रक्त, गुलाबी या श्वेत वर्ण के ३-८ इञ्च व्यास के पुष्प इसमें
आते हैं । यह सभी स्थानों पर होता है । इसमें पुष्प केवल सुबह ही खिलते हैं ।
(२) N. pubescens Willd. (नि. प्यूबेसेन्स) । यह उपर्युक्त के समान ही है किन्तु इसमें पुष्प कुछ छोटे तथा
पत्र अधोतल पर रोमश होते हैं ।
(३) N. stelleta willd. (नि. स्टेल्लेटा) । इसमें पुष्प नीले, हलके बैंगनी तथा ३-६ इञ्च व्यास में आते हैं ।
यह भी सभी उष्ण भागों में होता है ।
रासायनिक संगठन-नि. अल्बा के मूलों में निम्फीन (Nymphaeine) नामक क्षाराभ तथा अन्य कषाय द्रव्य
पाये जाते हैं । इस क्षाराभ का वातनाड़ी संस्थान के ऊपर विषैला प्रभाव पड़ता है । इसके पुष्पों में हृदय पर परिणाम करने
वाला निम्फैलिन (Nymphalin) नामक ग्लूकोसाइड पाया जाता है । इसमें के क्षाराभ का चूहा, मेढक, गिनी पिग तथा
कबूतर के मस्तिष्क पर घातक परिणाम होता है तथा श्वसन संस्थान की विषाक्तता होकर मृत्यु होती है ।
पुष्प एवं कंद के क्षाराभों का अल्प मात्रा में शामक (Sedative) प्रभाव पड़ता है ।
गुण और प्रयोग-इसके गुणादि कमल जैसे ही होते हैं । मूल ग्राही एवं कुछ मादक होता है । पुष्प कामसादक
होते हैं ।
इसके मूल को प्रवाहिका में देते हैं । पुष्प तथा फल का फांट अतिसार में दिया जाता है तथा इसे स्वेदजनक मानते
हैं ।
अथ वारिपर्णी शैवालञ्च (जलकुम्भी-सिवार) ।
तयोर्नामानि गुणाँश्चाह
वारिपर्णी कुम्भिका स्याद्वारिमूली खमूलिका । शैवालं जलनीली स्याच्छैवलं जलजञ्च तत् ।।१९९।।
वारिपर्णी हिमा तिक्ता लघ्वी स्वाद्धी सरा कटुः । दोषत्रयहरी रूक्षा शोणितज्वरशोषकृत् ।।२००।।
शैवालं तुवरं तिक्तं मधुरं शीतलं लघु । स्निग्धं दाहतृषापित्तरक्तज्वरहरं परम् ।।२०१।।