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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५५६ भावप्रकाशनिघण्टुः
विदारीकन्द के विदारी एवं क्षीरविदारी ये दो भेद चरक ने मधुरस्कंध (वि० अ० ८) में लिखे हैं। प्यूरेरिआ ट्युबरोजा
(Pueraria tuberosa) को विदारी एवं आइपोमिआ डिजिटेटा (Ipomoea digitata) को क्षीरविदारी अधिकांश
विद्वानों ने माना है। 'भुइकुम्हडा' नाम उपर्युक्त दोनों कन्दों को तथा ट्राईकोसॅन्थिस् कॉर्डेटा राक्स (Trichosanthes
cordata Roxb.) के कन्द को भी देते हैं। सम्भव है डायोस्कोरिएसी (Dioscoreaceae) वर्ग जिस वर्ग का
वाराहकन्द है उसी वर्ग के विदारी एवं क्षीरविदारी भी हों। उत्तर प्रदेश में अधिकतर प्यु. ट्युबरोजा को एवं बंगाल में आ.
डिजिटेटा को विदारीकन्द माना जाता है। एक क्षीर युक्त लता लेट्सोमिया सेटोसा राक्स (Lettsomia setosa,
Roxb.) के कन्द का स्तन्यवर्धक के रूप में प्रयोग प्रचलित है। संभव है यह क्षीरविदारी हो। यहाँ पर प्रथम दो का
अलग-अलग वर्णन किया गया है।
९१. विदारीकन्द (१)
हिं० - विदारीकन्द, विलाईकन्द, भुइकुम्हड़ा, सुराल, पाताल कोहड़ा। म० - बेंदर, घोडवेल। गु० - खाखर बेल,
फगियो, फगड़ानो वेली, विदारी। बं० - शिमीय। ते० - दारी, नेल्लगुम्मुडु। मा० - गोरवेल। ले० - Pueraria
tuberosa DC. (प्युरॅरिआ ट्युबरोजा डीसी.)। Fam. Leguminosae (लेम्युमिनोसी)।
'यह कोंकण के पहाड़ों पर, दक्षिण, कनारा, पश्चिम-हिमालय, शिमला, कुमाऊ, नेपाल, विन्ध्याचल, उड़ीसा और
छोटा नागपुर में उत्पन्न होता है और बिहार में भी कहीं-कहीं पाया जाता है। यह नदी-नालों के करारों में अधिक पाया
जाता है।
यह अत्यन्त विस्तार में फैलने वाली लता जाति की वनस्पति अचिरस्थायी होती है। इसका कांड पोला-सा होता
है। छाल - भूरे रंग की आध इञ्च मोटी होती है। लकड़ी - छिद्रयुक्त कोमल होती है। पत्ते - पलाश के समान पक्षाकार
त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक - ४-६ इञ्च लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े, अग्र्य पत्रक तिर्यगायताकार और पार्श्वपत्रक तिरछे लट्वाकार
तथा अधरतल पर श्वेत तलशायी रेशमतुल्य सघन रोओं से युक्त होते हैं। पुष्प - ६-१८ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते
हैं। पुष्प नीले या नीलरक्त रंग के सुन्दर दिखलाई देते हैं। फलियाँ - २-३ इञ्च तक लम्बी, चिपटी, बीजों के बीच दबी
हुई और खाकी रंग के रोवों से भरी रहती हैं। प्रत्येक फली में २-६ तक बीज रहते हैं। प्रायः पत्तों के गिरने पर नवीन
पत्तों के निकलने के प्रथम ही फूल आते हैं।
जमीन के नीचे इसमें प्रायः कई कन्द रहते हैं, जो कांड से दृढ़मूल शाखा के द्वारा जुड़े रहते हैं और नीचे भी मूल
शाखा पुनः निकली रहती है। इन्हीं को विदारीकन्द कहते हैं। यह गोल कुम्हड़े के आकार के भूरे रंग का एवं लम्बाई
में २ फीट तक तथा घेरे में २।। फीट तक बड़ा होता है। पुराना कन्द २० सेर से भी अधिक वजन का देखने में आता
है, किन्तु छोटे कन्द की अपेक्षा बड़े कन्द हीनवीर्य समझे जाते हैं। छोटे कन्द उखाड़ने के बाद कुछ दिनों तक बिगड़ते
नहीं हैं परन्तु बड़े कन्द बहुत जल्द सड़-गल जाते हैं। छोटे-छोटे कन्दों के पतले-पतले कतरे कर सुखाने से व दूध
के समान श्वेत दिखाई पड़ते हैं तथा विदारीकन्द नाम से बाजार में बिकते हैं। बड़े कन्द की अपेक्षा छोटे कन्द का स्वाद
अच्छा और मीठा होता है। छोटे-छोटे मुलायम और नवीन कन्द हरिद्वार आदि की सब्जीमण्डियों में 'सराल' के नाम से
बिकते हैं। कन्दों में कुछ-कुछ मुलेठी का स्वाद आता है इसलिये विदारी को 'स्वादुकन्दा', 'इक्षुविदारी' आदि नाम दिया
गया है। ये लताएँ घोड़ों को बहुत प्रिय होती हैं जिससे इन्हें 'गजवाजिप्रिया' 'घोड़ेबेल' कहा गया है।
गुण और प्रयोग - यह स्तन्यजनन, मूत्रजनन तथा पौष्टिक है। शोथ पर पीस कर इसे बाँधते हैं। बल एवं दुग्धवृद्धि
के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। अधिक मात्रा से इससे वमन होता है।
मात्रा - १/४ - १/२ तोला।
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