भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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(२) सभी प्रकार के कफविकारों में इससे लाभ होता है । १५-३० र० चूर्ण को खिलाने से इपिकाक की तरह
१ घंटे के अंदर वमन होकर कफ बाहर निकल जाता है तथा कभी-कभी विरेचन भी होता है । प्रतिश्याय तथा गले का
नूतन शोथ, श्वासनलिकाशोथ आदि में घोड़बच के साथ अर्कादिचूर्ण (अर्कचूर्ण २, अफीम १, सैंधव ७; मात्रा-३-७
र०) का उपयोग किया जाता है । तमकश्वास तथा श्वसनिकाभिस्तीर्णता (Bronchiactasis) आदि व्याधियों में इसके
प्रयोग से पर्याप्त लाभ होता है ।
(३) यकृत् एवं प्लीहावृद्धि तथा उससे उत्पन्न उदर, पित्त का स्राव ठीक न होने के कारण उत्पन्न अतिसार तथा
नई एवं पुरानी आँव में इसका बहुत उपयोग किया जाता है । आँव में छाल को ३०-४० रत्ती की बड़ी मात्रा में देना चाहिये
किन्तु इसके साथ अफीम एवं सुगन्धित पदार्थ भी देने चाहिए अन्यथा वमन की संभावना रहती है । कुपचन में १/२ रत्ती
छाल देने से पाचनशक्ति बढ़ती है ।
(४) जीर्ण ज्वर एवं विसर्गी ज्वर में इसका फांट पिलाते हैं । मलेरिया में इसकी छाल पान के साथ खिलाते हैं ।
(५) जीर्ण आमवात में अर्कादिचूर्ण सोंठ के साथ रात को देने से पसीना होता है, संधिशूल कम होता है एवं
निद्रा आती है ।
इसके दुग्ध का मोटा लेप करने से त्वचा का दाह होकर फोड़े उत्पन्न होते हैं किन्तु पतला लेप अल्प वेदनाहर
एवं लोमशातक है । इसके आन्तरिक प्रयोग से अत्यन्त विरेचन होता है । इसके गुण भी मूल की तरह ही होते हैं किन्तु
इसका कम जादा प्रभाव होता है ।
(१) यकृत् एवं प्लीहावृद्धि तथा तज्जन्य उदर में इसका आन्तरिक प्रयोग करते हैं ।
(२) मोच, मरोड़ एवं संधिशोथ में नमक में इसको मिलाकर लगाने से सूजन कम होती है । दारुहरिद्रा के चूर्ण
में इसको मिलाकर उसकी बत्ती भगंदर तथा नाड़ीव्रण में डालते हैं । दाद एवं छाजन आदि त्वचा के रोगों में एवं आमवात
में इसको हल्दी के साथ तिल के तैल में उबालकर मालिश करते हैं । अर्श में यद्यपि इसका लेप करते हैं तथापि इससे
बहुत तकलीफ होती है । मुखरोगों में मधु के साथ इसे लगाते हैं । कृमिदन्त में दाँत के गढ़े में इसे लगाने से दर्द कम
होता है ।
इसके पुष्प दीपन, पाचन, कफघ्न एवं उद्वेष्टननिरोधी हैं । मूल की अपेक्षा ये गुण इसमें अधिक स्पष्ट दिखलाई
देते हैं ।
(१) क्षुधानाश तथा कुपचन में इससे अच्छा लाभ होता है ।
(२) खाँसी एवं दमा में इसके फूलों को राब में उबालकर देते हैं ।
इसके पत्ते वातहर, शोथहर, व्रणशोधक, व्रणरोपक एवं आनुलोमिक हैं ।
(१) जीर्ण व्रण पर इसका चूर्ण डालने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं ।
(२) इसके पत्तों को रेंड़ी का तेल लगाकर गरम करके सूजन पर बाँधने से सूजन तथा पीड़ा कम होती है ।
(३) बच्चों के आध्मान में पेट पर इनको बाँधने से एकाधबार पाखाना होकर आध्मान कम होता है ।
(४) इसके पत्तों को तेल में उबाल कर चोट पर उसकी मालिश की जाती है ।
(५) इसके पत्ते एवं सैंधव को समान भाग में लेकर बन्द हाँड़ी में गरम करके बनाई हुई राख तक्र के साथ उदररोग
में देते हैं ।
मात्रा—मूलत्वक्चूर्ण १ १/२-२ १/२ रत्ती; वामक १५-३० रत्ती; दुग्ध १-२ रत्ती; पत्रचूर्ण २ रत्ती-१ माशा; फूल
१-३ रत्ती ।
३४ भाव.I