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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 481

४३० भावप्रकाशनिघण्टुः
हो वहीं पर प्रियंगु के लिये कंगु का उपयोग किया जा सकता है अन्यथा प्रियंगु से कर्पूरादिवर्गोक्त प्रियंगु ही लेना उचित
है। कुछ लोगों ने कंगु से पार्थक्य करने के लिये इसको गंधप्रियंगु लिखा है लेकिन भावप्रकाशकार ने यहाँ पर प्रियंगु
तथा गंधप्रियंगु दो द्रव्यों का उल्लेख किया है। यहाँ पर इन दोनों के गुण समान बतलाये हैं। धान्यवर्गोक्त कंगु, जिसका
एक पर्याय प्रियङ्गु है, उसके तथा यहाँ पर उल्लिखित प्रियङ्गु के गुण समान नहीं हैं, यह बात ध्यान में रखने की है।
निम्नलिखित वर्णन केवल यहीं पर वर्णित प्रियंगु का है कंगु (धान्य) का नहीं।
यहाँ पर उपर्युक्त श्लोकों में जिन दो द्रव्यों का उल्लेख किया गया है, उनके लिये गंधप्रियंगु नाम देना ठीक है।
हो सकता है कि प्रियङ्गु के संदिग्ध द्रव्य रहने के कारण दो विभिन्न प्रकार के द्रव्यों का उपयोग भावप्रकाशकार के समय
होता रहा हो, जिनमें से एक में गंध हो तथा दूसरे में गंध न हो या बहुत कम हो अथवा एक ही प्रकार के दो क्षुप हों
जिनमें से एक में गंध हो और दूसरा निर्गंध हो, जिसका आगे स्पष्टीकरण होगा।
आजकल इसी उपर्युक्त 'प्रियंगु, गंधप्रियंगु' के लिये तीन प्रकार के द्रव्यों का उपयोग किया जा रहा है। बंबई की
तरफ घऊँला नाम से प्रूनस् महालिब् (Prunus mahaleb) की फलमज्जा बिकती है, जिसका उपयोग प्रियंगु के रूप
में वहाँ पर करते हैं। बंबई प्रान्त में श्वेतचंदन, घऊँला एवं कपूरकचरी को जल में पीस कर सुगंधित लेप के लिये प्रयोग
किया जाता है। चरक ने रक्तपित्त में दाहशांति के लिये चन्दन और प्रियंगु के लेपन से उपलिप्त स्त्रियों के स्पर्श का विधान
किया है। १ यह मज्जा छोटी चिरौंजी जैसी, गोधूमवर्ण की, स्वाद में तिक्त एवं सुगन्धित होती है। दूसरा द्रव्य ॲग्लेइआ
रॉक्सबर्धियाना (Aglaia roxburghiana) के फल हैं जो कुछ गोल, छोटे, निंब फल सदृश एवं सूखने पर
सिकुड़नदार दिखलाई देते हैं। इनका व्यवहार बहुत दिनों से होता आ रहा है लेकिन इसमें गंध नाम मात्र की होती है।
तीसरा द्रव्य कॅलिकार्पा मॅक्रोफाइला (Callicarpa macrophylla) नामक गुल्म (झाड़ी) की पुष्प कलिकायें हैं जो
छोटी-छोटी कंगुनी धान्य सदृश होती हैं। इसका वर्णन अभिनव बूटी दर्पण में है लेकिन वहाँ पर इसका लेटिन नाम
नहीं लिखा है। इसके लेटिन नाम के साथ इसका वर्णन श्रीमान् ठा० बलवन्त सिंह जी ने 'वनौषधिदर्शिका' एवं 'बिहार
की वनस्पतियाँ' इन पुस्तकों में किया है। मूल श्लोक एवं अन्य निघंटुओं में दिये हुए फलिनी, कृष्णपुष्पी, गन्धफला,
कृशांगी, महिलाह्वया, पर्णभेदनी आदि इसके रूपपरिचयात्मक पर्याय इससे कुछ मिलते होने के कारण इसको प्रियंगु मानते
हैं। एक बात ध्यान देने की है कि इसकी झाड़ी या गुल्म होता है। यह लता नहीं है। पुष्प भी श्वेत वर्ण के होते हैं।
श्रीमान् बाबू भीमचन्द्र चटर्जी द्वारा लिखित 'दि एकॉनॉमिक बोटॅनी ऑफ इण्डिया' से 'अभिनव बूटी दर्पण' में कुछ अंश
उद्धृत किया गया है जिसमें वे लिखते हैं कि 'नेपाल, चटगाँव तथा पूर्व बंगाल के कुछ भागों में इसी का व्यवहार प्रियंगु
के रूप में लोग करते हैं। नेपाल में दयालो तथा श्वेतदयालो नाम से उपयोग में लाई जाने वाली लताओं का वर्णन
उपर्युक्त लता से ठीक मिलता है। श्वेतदयालो तथा दयालो एक ही समान हैं किन्तु अन्तर इतना ही है कि श्वेतदयालो
गन्धयुक्त होती है एवं इसके पत्ते कुछ बड़े, अधिक श्वेत तथा स्पर्श में खुरदरे होते हैं। इससे मालूम होता है कि
भावप्रकाशोक्त प्रियंगु तथा गन्धप्रियंगु यह दयालो तथा श्वेतदयालो हैं। जिला गढ़वाल और अल्मोडा में दहिया के नाम
से यह प्रसिद्ध है तथा कुमाऊँ प्रान्त के वैद्य इसको प्रियंगु मानते हैं।'
इन तीन द्रव्यों के अतिरिक्त मेंहदी के फूल, कुमुदनी, सरसों के फूल, मालकांगुनी एवं गोंदनी आदि को भी कुछ
लोग प्रियंगु मानते हैं। चरक में संधानीय, शोणितास्थापन, पुरीष संग्रहणीय एवं मूत्रविरजनीय गणों में तथा सुश्रुत में
अञ्जनादि, एलादि तथा प्रियंग्वादिगणों में प्रियंगु का उल्लेख है। चरक ने रक्त और पित्त की अतिवृद्धि को शान्त करने
वालों में गन्धप्रियंगु को श्रेष्ठ माना है (च० सू० अ० २५) उपर्युक्त तीन द्रव्यों का वर्णन यहाँ दिया जा रहा है।
१. प्रियङ्गुकाचन्दनरूषितानां स्पर्शाः प्रियाणं च वराङ्गनानाम्। (च. चि. अ. ४)