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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 471

४२० भावप्रकाशनिघण्टुः
इसका क्षुप-सीधा तथा १।।-३ फीट ऊँचा होता है और समस्त क्षुप पर बारीक रोवें होते हैं। पत्ते-१ से ३ इञ्च
लम्बे गोलाकार हृदयाकृति, कंघी के पत्तों के आकार वाले, ३ से ५ भागों में थोड़ी दूर तक विभक्त और ऊपर के पत्ते
दन्तुर होते हैं। पत्तों को मसलने से चिपचिपापन मालूम होता है। शाखाओं के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं।
पुष्पदल-किञ्चित् हलके गुलाबी रंग के होते हैं। फल-अण्डाकृति, छोटे एवं चने बराबर होते हैं। बीज-भूरे रंग के,
तैल से युक्त लेकिन गन्धहीन होते हैं। मूल-७-८ इञ्च लम्बे, प्रायः ऐंठे हुए तथा अधिक से अधिक १/४ इञ्च मोटे,
चिकने, भूरे रंग के तथा अनेक उपमूलों से युक्त रहते हैं। इसमें कस्तूरी के समान सुगन्ध रहती है। औषध में इन्हीं मूलों
का व्यवहार किया जाता है।
नोट-बाजार में सुगन्धबाला के नाम से मिलने वाला गाँठदार द्रव्य सुगन्धबाला नहीं है। उसे असली तगर मानते
हैं। उसका वर्णन पहले किया गया है। कुछ लोगों ने इसके लैटिन नाम में खस का लेटिन नाम दिया है, वह उचित
नहीं है। कुछ लोगों ने खस जाति के ही दूसरे तृण का लैटिन नाम सुगन्धबाला के लिए दिया है जिसको कुछ लोग
खस का ही पर्याय मानते हैं।
रासायनिक संगठन-इसमें लुआबदार पदार्थ तथा उत्तेजक सुगन्धि द्रव्य हैं।
गुण और प्रयोग-सुगन्धबाला शीतल, स्नेहन, दीपन, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं बल्य है।
इसका उपयोग ज्वर, रक्तपित्त, दाह, तृषा, हल्लास, वमन, अतिसार, व्रणशोथ एवं विसर्प में किया जाता है।
(१) किसी भी प्रकार के ज्वर में षडंग पानीय के रूप में नागरमोथा, पित्तपापड़ा, खस, श्वेत चन्दन, सुगन्धबाला
एवं सोंठ का क्वाथ देने से ज्वर का दाह एवं प्यास कम हो जाती है।
(२) बेल के साथ इसका उपयोग संग्रहणी में लाभकर होता है। अतिसार में आदी के साथ इसको फाण्ट बना
कर पिलाते हैं। बच्चों के अतिसार में चावल के धोवन के साथ मिश्री, मधु तथा सुगन्धबाला देते हैं। वमन, हल्लास
आदि में भी तण्डुलोदक के साथ इसको देते हैं।
(३) रक्तपित्त में चन्दन, मिश्री तथा तण्डुलोदक के साथ इसका प्रयोग किया गया है।
(४) विसर्प में इसके चूर्ण को घृत के साथ लेप करते हैं। श्वित्र में इसकी जली हुई काली राख का लेप लाभदायक
माना जाता है।
मात्रा-३-६ माशा।
अथ वीरणम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
स्याद्वीरणं वीरतरुर्वीरञ्च बहुमूलकम्। वीरणं पाचनं शीतं वान्तिहल्लघु तिक्तकम् ॥८४॥
स्तम्भनं ज्वरनुद् भ्रान्तिमदजित्कफपित्तहृत्। तृष्णाऽस्रविषवीसर्पकृच्छ्रदाहव्रणापहम् ॥८५॥
वीरण अर्थात् गांडर घास के नाम तथा गुण-वीरण, वीरतरु, वीर और बहुमूलक ये नाम संस्कृत में वीरण
के हैं। वीरण-पाचक, शीतवीर्य, वमन को दूर करने वाला, लघु, तिक्त रसयुक्त एवम् स्तम्भक होता है। यह
ज्वर, भ्रमरोग, मदरोग, कफ, पित्त, तृषा, रक्तप्रकोप, विष, वीसर्प, मूत्रकृच्छ्र, दाह और व्रण को दूर करने वाला होता
है। [८४-८५]
अथोशीरम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
वीरणस्य तु मूलं स्यादुशीरं नलदञ्च तत्। अमृणालञ्च सेव्यञ्च समगन्धिकमित्यपि ॥८६॥
उशीरं पाचनं शीतं स्तम्भनं लघु तिक्तकम् ॥८७॥