भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ भावप्रकाशनिघण्टुः
छाल का व्यवहार किया जाता है। इसका बाह्यपृष्ठ चिकना धूसरित हरा (यदि कार्क (Cork) के साथ हो तो) तथा आड़ी
धारियों से युक्त, अंदर का पृष्ठ हलका पीला लेकिन रक्ताभ बादामी दिखलाई देता है तथा इसमें लम्बाई में गढ़ेदार धारियाँ
होती हैं। भग्न-छोटा, बाह्य भाग में दानेदार लेकिन अन्दर का कुछ तन्तु युक्त। बाह्य भाग (Cortical) रक्ताभ बादामी
रङ्ग का। गन्ध-हलकी मधुर लेकिन बन्द डिब्बों में रखने पर तेज हो जाती हैं। स्वाद-मधुर, सुगन्धि तथा कुछ दाहजनक।
नोट-एक अन्य प्रकार के पठानी लोध्र का वर्णन आगे किया गया है। लोध्र तथा पठानीलोध्र दोनों ही के गुण
करीब-करीब समान ही हैं तथा दोनों ग्राही एवं अतिसारादि में लाभदायक होते हैं। लोध्र का एक पर्याय तिल्वक आया
है। चरक के कल्पस्थान में तिल्वक् के मूल की (अन्दर की त्वचा रहित) बाह्य त्वचा का उपयोग विरेचन कराने के लिये
किया गया है। इससे भ्रम होता है कि एक ही वस्तु विरेचक तथा ग्राही कैसे हो सकती है। व्यवहार में भी लोध्र की
छाल विरेचक नहीं होती। शांवर या पठानी लोध दोनों की मूल त्वक् का प्रयोग किया गया किन्तु उससे विरेचन नहीं
हुआ। इसके संबन्ध में एक श्लोक मिलता है।
तिल्वकोऽपि तदाकारो बृहत्पत्रो विशेषतः। रक्तत्वचो विरेकी च बृहल्लोध्रेति कथ्यते ।।
डल्हण तिल्वक् के सम्बन्ध में लिखते हैं—तिल्वकः रोध्रः, अन्ये तु रोध्राकारो रक्तत्वक्को बृहत्पत्रो
वैरेचनिकः। इससे मालूम होता है कि लाल छाल वाला, दीर्घ पत्र वाला एवं विरेचक गुणवाला कोई लोध्र के समान
वृक्ष होता है जो तिल्वक है। अभी इसका निर्णय नहीं हो पाया है। कुछ विद्वानों ने तिल्वक् के स्थान पर रेवाचीनी की
छाल का उपयोग विरेचन के लिये करने को कहा है।
रासायनिक संगठन-लोध की छाल में सम्पूर्ण क्षाराभ की मात्रा करीब ०.३२% होती है जिसमें से एक रवेदार
क्षाराभ लोट्युराइन ०.२४%, अन्य चूर्णरूप में क्षाराभ लोट्युरिडाइन ०.०६% एवं एक और रवेदार क्षाराभ कोल्लोट्युराइन
०.०२% होते हैं। इसकी राख में सोडियम् कार्बोनेट रहता है तथा छाल में लाल रंजक पदार्थ बहुत अधि मात्रा में होते
हैं। इसमें टैनिन द्रव्य नहीं होते। इसमें का लोट्युराइन क्षाराभ ॲब्राइन एवं हार्मैन के सदृश होता है। इसके सभी क्षाराभ
विरल अम्ल घोल में अत्यन्त तेज नील-नीललोहितातीत चमक उत्पन्न करते हैं।
गुण और प्रयोग-लोध की छाल ग्राही, शीतल, रक्तस्तंभक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक, शोथघ्न, बल्य एवं चक्षुष्य
है। इससे छोटी रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तस्राव बन्द होता है। इससे श्लेष्मल त्वचा को शक्ति प्राप्त होकर
एवं उसका संकोच होकर श्लेष्मा की उत्पत्ति कम होती है।
इसका उपयोग अतिसार, प्रवाहिका, रक्तातिसार, रक्तप्रदर, अत्यार्तव, श्वेतप्रदर, सर्वाङ्गशोथ, यकृद्विकार, ज्वर
एवं नेत्ररोगों में किया जाता है।
(१) लोध्र अतिसार एवं प्रवाहिका के लिये बहुत अच्छी औषधि है। इसमें इसके प्रवाही सत्त्व को १/२ ड्रा० की
मात्रा में देने से इपीकाक से जिनको लाभ नहीं हुआ था उन्हें भी लाभ हुआ। इसमें बेल की गुद्दी, कुचला एवं कुरैया
की छाल के साथ इसका प्रयोग करते हैं या इसके साथ मुलेठी, अनार का छिलका एवं कायफल का प्रयोग किया जाता
है।
(२) रक्तप्रदर में इसके चूर्ण को १० रत्ती की मात्रा में दिन में ३, ४ बार मिश्री के साथ ३, ४ दिन तक देने से
बहुत लाभ होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होकर उसकी शिथिलता दूर होती है जिससे रक्तप्रदर एवं श्वेतप्रदर आदि
में यह उपयोगी है। गर्भिणी में ७वें या ८वें महीने में यदि गर्भ में अधिक चलन हो तो इसे छोटी पीपल एवं मधु के
साथ चटाने से गर्भाशय संकोच होकर चलन कम हो जाता है।
(३) आँखों में लाली तथा सूजन होने पर इसको पलकों के चारों तरफ लगाते हैं। इसके साथ मुलेठी, रसौंत एवं
भुनी फिटकिरी का उपयोग लेप में किया जाता है।