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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 354

रासायनिक संगठन-इसमें एक कारह्वक्राल (Carvacrol) नामक उड़नशील तैल पाया जाता है।
गुण और प्रयोग- यह दीपन, पाचन, वातनुलोमक, उद्वेष्ठननिरोधि एवं अश्म-रीघ्न है।
इसका उपयोग अपचन, आध्मान, उदरशूल, दमा, जीर्णकास, अपस्मार एवं मूत्रसंस्थान के रोगों में किया जाता है।
(१) अपचन, उदरशूल एवं आध्मान आदि में एक दो पत्तियों के ही उपयोग से शीघ्र लाभ होता है। बच्चों के
उदरशूल में यह विशेष लाभदायक है।
(२) दमा, जीर्णकास एवं अपस्मार आदि में इसका क्वाथ दिया जाता है।
(३) नेत्राभिष्यन्द में इसका स्वरस पलकों पर लगाने से वेदना कम होती है।
(४) शिरःशूल तथा गोजर के काटने पर इसको पीसकर लगाने से वेदना दूर होती है।
मात्रा-स्वरस ५-६ बूँद शर्करा के साथ।
(५) Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर.)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी)।
सं०-पाषाणभेदक। हिं०-छोटा पाषाणभेद। ता०-चेप्पुंजेरिज्झल। ने०-खोलासइस। बर्मा-मोमाका।
इसकी हमेशा हरी रहने वाली झाड़ी आसाम, उत्तरी बंगाल, पश्चिम प्रायद्वीप, वर्मा तथा मध्य प्रदेश में उत्पन्न होती
है। इसके पत्र-३ से ६ इञ्च लम्बे तथा १/२-३/४ इञ्च तक चौड़े होते हैं। पुष्प-मंजरी में छोटे-छोटे आते हैं। इसकी
जड़ का उपयोग किया जाता है।
गुण और प्रयोग-यह मूत्रल तथा मृदुविरेचक होता है। इसका क्वाथ अर्श, मूत्राशय की अश्मरी, सोजाक एवं
फिरंग में प्रयुक्त होता है।
(६) Rotula aquatica Lour. (रोट्रला अॅक्वॅटिका लोर.)। Fam. Bora-ginaceae (बोर्रोजिनेंसी)।
सं०-पाषाणभेद। ता०-चेप्पुनेरिज्झल।
यह सभी स्थानों पर विशेषकर नदी के कछार में होता है। इसकी छोटी झाड़ी होती है। पत्ते-½-१ इंच लम्बे,
विनाल, स्रुवाकार तथा न्यूनाधिक रोमश होते हैं। पुष्प-छोटे तथा गुलाबी रंग के आते हैं।
गुण और प्रयोग-इसका मूल पाषाणभेदक के समान अर्श, मूत्राशय की अश्मरी एवं फिरंगादि रतिजन्य रोगों
में व्यवहृत होता है।

अथ धातकी (धाई) तस्या नामानि गुणाँश्चाह

धातकी धातुपुष्पी च ताम्रपुष्पी च कुञ्जरा¹। सुभिक्षा बहुपुष्पी च वह्निज्वाला च सा स्मृता ।। १८४ ।।
धातकी कटुका शीता मृदुकृत्तुवरा लघुः । तृष्णाऽतीसारपित्तास्रविषकृमिविसर्पजित् ।। १८६ ।।
धायके नाम तथा गुण-धातकी, धातुपुष्पी, ताम्रपुष्पी, कुञ्जरा, सुभिक्षा, बहुपुष्पी और वह्निज्वाला ये सब धाय
के नाम हैं। धाय-कटु तथा कषायरसयुक्त, शीतवीर्य, मृदुकारक (पाठान्तर मदकारक) और लघु है और यह प्यास,
अतिसार, रक्तपित्त, विष, कृमि और विसर्प को दूर करती है। [१८४-१८६]

६३. धातकी

हिं०-धातकी, धवई, धाई, धाओला, धावा, धाय (धाय के फूल)। बं०-धाइफुल। म०-धायटी, धावस।
गु०-धावणी, धावडी ना फूल। क०-धातकि। ते०-सेरिंजी, एर्रापुर्वु। उ०-जातिको। पं०-धा। अवध-धेती।
१. 'मदकृदिति पाठा.।