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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २९७
(७) सिरके में इसे घिसकर मसूढ़ों पर रगड़ने से दंतशूल दूर होता है तथा मसूढ़े मजबूत होते हैं।
(८) इससे सिद्ध तैल का प्रयोग कर्णशूल में कर्णबिन्दू के रूप में किया जाता है।
(९) हैजे में हाथ पर ठंडे हो जाने पर इसके चूर्ण को सोंठ के साथ मिलाकर हाथ पैरों पर मलते हैं।
(१०) इसके फलों को उबालने से एक मोम के सदृश पदार्थ निकलता है जिसका व्रण पूरण के लिये प्रयोग करते
हैं।
मात्रा-चूर्ण १०-३० र० आर्द्रक रस एवं मधु के साथ। बच्चों को १-२ रत्ती।
अथ भार्गी (भारङ्गी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह
भार्गी भृगुभवा पद्मा फञ्जी ब्राह्मणयष्टिका। ब्राह्मण्याङ्गारवल्ली च खरशाकश्च हञ्जिका ।।१८२।।
भार्गी रूक्षा कटुस्तिक्ता रुच्योष्णा पाचनी लघुः । दीपनी तुवरा गुल्मरक्तनुन्नाशयेद् ध्रुवम् ।।
शोथकासकफश्वासपीनसज्वरमारुतान् ।।१८३।।
भारङ्गी (बभनेटी) के नाम तथा गुण-भार्गी, भृगुभवा, पद्मा, फञ्जी, ब्राह्मणयष्टिका, ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ल,
खरशाक और हञ्जिका ये सब नाम भारङ्गी के हैं। भारङ्गी-रूक्ष, कटु, कषाय तथा तिक्तरसयुक्त रुचिजन्क, उष्णवीर्य,
पाचक, लघु तथा अग्निदीपक होती है। एवं गुल्म, रक्तदोष, शोथ, कास, कफ, श्वास, पीनस, ज्वर और वायु को नष्ट
करती है। [१८२-१८३]
६१. भार्गी (भारङ्गी)
भारङ्गी के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद है तथा इस नाम से ४ वनस्पतियों की छाल ली जाती है। बङ्गाल
में क्वाशिया नामक डाक्टरी ओषधि का प्रतिनिधि 'ख' का व्यवहार भारङ्गी नाम से होता है। श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी
अपनी 'वनौषधि दर्शिका' नामक पुस्तक में लिखते हैं कि भारङ्गी नाम से बाजार में बिकने वाली छाल क्लेरोडेंड्रान
(Clerodenron) की नहीं मालूम होती जिसे अधिकांश लोगों ने भारङ्गी माना है तथा यह संभवतः 'ख' की ही छाल
हो। डॉ० देसाई 'क' को ही शास्त्रीय भारङ्गी मानते हैं तथा अन्य अधिकांश विद्वानों ने भी इसे ही भारङ्गी माना है। अन्य
दो 'ग' वनस्पतियों का भी कहीं-कहीं व्यवहार होता है। इन चारों वनस्पतियों का अलग-अलग वर्णन नीचे दिया जा
रहा है।
प्राचीन समय में इसका आन्तरिक प्रयोग श्वास, कास आदि में किया गया है तथा सुश्रुत (उ० अ० ६१) में अपस्मार
के लिये एक विशेष प्रकार से निर्मित सुरा का प्रयोग बतलाया गया है। इसका बाह्य प्रयोग गण्डमाला, कुरंड (वृद्धि)
तथा शस्त्रक्षत में किया गया है।
(क) Clerodendron serratum, Spreng. (क्लेरोडेण्ड्रोन् सेरैटम्, स्प्रेँग)। Fam. Verbenaceae
(हर्बिनेंसी)। हिं०-भारङ्गी, भारिङ्गी, ब्रह्मयष्टि, बभनेटी। बं०-वामन हाटी, भुइजाम, म०-भारङ्ग। गु०-भारङ्गी।
क०-गंटुभारङ्गी। ते०-नालनिरैडु। ने०-चूया। पं०-भाड़ङ्गी। मा०-भाराङ्गमूल। ता०-चेरूटेकू। जौनसार०-
वनबाकरी। फा०-हञ्जिका।
यह हिमालय में सतलज से खासिया पहाड़ और आसाम तक तथा ब्रह्मा, नीलगिरी, पश्चिमघाट थाना, रत्नांगिरी
और सिलोन में पाई जाती है। इसके पौधे ३ से ५ हजार फीट की ऊँचाई तक प्रायः पर्वतों के घासवाले ढालों पर होते
हैं।
भारङ्गी क्षुप जाति की वनौषधि ४-८ फीट तक ऊँची होती है। शाखाएँ-इसके काष्ठमय मूलस्तम्भ से प्रतिवर्ष
शाखाएँ निकलती हैं। प्रत्येक गाँठ पर तीन-तीन पत्ते रहते हैं जो ४ से ८ इञ्च लम्बे, १ १/२-२ १/२ इञ्च चौड़े, आयताकार,