भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७६ भावप्रकाशनिघण्टुः
(१) एक फल कूट कर २ १/२ तो० जल में १ घंटा भिगोकर रखना चाहिये । फिर पत्थर के खरल में घोंटकर,
कपड़े से छान कर, उसमें थोड़ा मधु तथा पीपर मिलाकर खाली पेट पिलाने से १ घण्टे बाद १-२ साफ वमन हो जाता
है और कभी-कभी बाद में विरेचन भी होता है । इस वामक प्रयोग को हृष्ट-पुष्ट मनुष्य में व्यवहार में लाना चाहिये ।
(२) इसके २-३ फलों के गूदे को कूट कर १/२ पाव जल में १०-१५ मिनट मसल कर छानकर प्रयोग किया
जाय तो प्रायः १० मिनट में हल्लास और वमन शुरू हो जाता है । इसको देने के बाद उष्ण जल पिलाने से और भी
वमन होता है । या केवल १ फल का गूदा भी पर्याप्त हो सकता है ।
(३) इसके गूदे को सुखाकर रख सकते हैं तथा १ से ४ माशे तक वामक औषधि के रूप में या १-१/२-५ र०
कफनिःसारक एवं स्वेदल औषधि के रूप में व्यवहार में ला सकते हैं ।
(४) मुलेठी, मन्दार एवं मैनफल का चूर्ण २-७ र० देने से श्वास तथा खाँसी में लाभ होता हैं एवं अधिक मात्रा
में (१०-३० र०) अजीर्ण, शूल, शिरःशूल और अण्डकोष शोथ में वमन कराने के लिये देते हैं ।
(५) अन्य सुगन्धि औषधियों के साथ रक्तातिसार, पार्यायिक ज्वर एवं शिरःशूल में इसके गूदे को देते हैं । अतिसार
में १ से २ माशा गूदा दिया जाता है । यह इपीकाक् का अच्छा प्रतिनिधि है ।
(६) इसके गूदे का टिंक्चर १५-६० बूँद कुकास एवं पागलपन में तथा उद्वेष्ठन निरोधि एवं शामक औषधि के
रूप में व्यवहार में लाया जाता है ।
(७) इसका फलत्वक् एवं बीज विरेचक एवं कृमिघ्न है एवं बच्चों में पित्तमयता तथा कृमि दूर करने के लिये
व्यवहार में आता है ।
(८) इसके वृक्ष की छाल का बाह्य लेप शोथहर एवं वेदनाहर है एवं आमवात, फोड़े तथा चोट एवं हड्डियों की
पीड़ा पर लगाया जाता है । अतिसार, संग्रहणी, ज्वर तथा आमवात में इस वृक्ष की छाल का आन्तरिक प्रयोग में किया
जात है । कांजी के साथ इसके फल को पीस कर नाभि के चारों तरफ लगाने से उदरशूल दूर होता है । मुखदूषिका
(acne) एवं फोड़े आदि में इसके फल के लेप से लाभ होता है ।
(९) बच्चों में दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर इसके गूदे के चूर्ण को तालू तथा मसूढ़ों पर रगड़ते हैं ।
(१०) बन्ध्यत्व दूर करने के लिये ६ माशा इसके बीज के चूर्ण को दूध, शक्कर वा केशर के साथ खिलाना चाहिये
तथा ८, १० रत्ती चूर्ण की गुड़ के साथ बत्ती बनाकर योनि में धारण करानी चाहिये । इस प्रयोग से गर्भाशय शोथ आदि
विकार दूर होकर कष्टार्तव एवं अनियमितार्तव आदि में भी लाभ होता है ।
(११) सर्पविष में यह औषधि लाभदायक है । इसके मूल को बैल के मूत्र में पीसकर अंजन कराया जाता है तथा
शुष्क मज्जा का आन्तरिक प्रयोग (५-१५ र०) करते हैं ।
मात्रा-वामक-१ फल का हिम । गूदे का चूर्ण १-४ माशा । अन्य गुणों के लिये २-४ रत्ती ।
अथ रास्नाया नमागुणानाह
रास्ना युक्तरसा रस्र्या सुवहा रसना रसा । एलापर्णी च सुरसा सुगन्ध्या श्रेयसी तथा ।।१६२।।
रास्नाऽऽमपाचिनी तिक्ता गुरूष्णा कफवातजित् ।।१६३।।
शोथश्वाससमीरास्रवातशूलोदरापहा । कासज्वरविषाशीतिवातिकामयसिध्महृत् ।।१६४।।
रास्ना के नाम तथा गुण-रास्ना, युक्तरसा, रस्र्या, सुवहा, रसना, रसा, एलापर्णी, सुरसा, सुगन्धा तथा श्रेयसी,
ये सब रास्ना के नाम हैं । रास्ना-आम को पचाने वाली, तिक्तरस युक्त, गुरु, उष्णवीर्य और कफ वात नाशक है तथा