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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २७३
(४) S. paniculata Wall. (स्व० पॅनिक्युलॅटा) बं०- कड़वी ।
(५) S. perennis Linn. (स्व० पेरेन्न्रिस) ।
(६) S. corymbosa Wight (स्व० कोरिम्बोसा) ।
(७) S. affinis Clarke (स्व० अफिनिस्) ।
(८) Exacum bicolor Roxb. (एक्झाँकम् बाइकलर) ।—हिं०—बड़ा चिरायता ।
इसका क्षुप दक्षिण में कोंकण में बरसात के दिनों में उत्पन्न होता है । पुष्प—श्वेत और सुन्दर । दलपत्रों के अन्तिम
हिस्से जरा नीले से रहते हैं । गुण—पौष्टिक, अग्निवर्धक एवं करू की तरह ।
(९) E. tetragonum Roxb. (ए० टेट्रागोनम्)—हिं०—तितखन, म०—ऊदकिराईत ।
इसका वर्षायु क्षुप—उत्तर हिन्दुस्तान के पहाड़ी प्रदेश एवं हिमालय पर उत्पन्न होता है । यह एक हाथ ऊँचा,
कांड—चौपहल; पत्र—विपरीत, विनाल, शल्याकृति लेकिन कुछ चौड़े, एक अङ्गुल लम्बे और ५ शिरायुक्त; पुष्प—नीले ।
गुण—दीपन एवं कडुवा पौष्टिक । इसका प्रयोग जीर्णज्वर तथा कुपचन में किया जाता है ।
(१०) Erythraea roxburghii G. Don (एरिथ्रिआ रॉक्सवर्गाय) । बं०-गिर्मि । म०—लुन्तक ।
इसका छोटा क्षुप सभी जगह किन्तु समुद्र के किनारे तथा तर जमीन में अधिक होता है । यह बंगाल में नहीं होता ।
गुजरात तथा उत्तरी कोंकण में बहुत होता है । इसका क्षुप—एक बित्ता ऊँचा एवं बहुत शाखायुक्त होता है । कांड—सीधा,
चौपहल एवं मूल से ऊपर तक पत्र युक्त । पत्र—विपरीत, विनाल, शल्याकृति, सनाय वा इमली की तरह एवं ३
शिरायुक्त । पुष्प—श्वेत, छोटे, विनाल, प्रत्येक कोण में ३, ३ । फल—गोल फली । स्वाद—अत्यन्त कडुवा । इसके
पञ्चांग का व्यवहार गुजरात तथा मद्रास में अधिक किया जाता है ।
गुण और प्रयोग—यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, आनुलोमिक एवं तिक्त पौष्टिक है । इसकी रत्ती दो रत्ती मात्रा
में कुपचन में देते हैं ।
व्यामिश्रण—इनमें से प्रथम दो जेन्शियानेसी (Gentianaceae) वर्ग के हैं ।
(१) S. angustifolia Buch.-Ham. (स्व० अँगरिस्टफोलिया)—इसका कांड—चौपहल एवं पंखयुक्त होता
है । यह स्वाद में चिरायते की अपेक्षा कम कटु होता है एवं इसमें पिथ कोष (Pith cells) बहुत ही अल्प रहते हैं ।
(२) S. alata Royleex D. Don (स्व० अॅलाट)—यह बिलकुल कडुवा नहीं होता । इसमें पिथ (Pith)
पूर्ण सम्बंधित रहता है । चिरायता इससे अधिक गहरे रंग का, स्वाद में अत्यन्त कडुवा और इसका पिथ (Pith) सतत
(Continuous) रहता है ।
(३) Rubia cordifolia Linn. (रूबिया कॉर्डिफोलिया) (Fam.–Rubiaceae– रूबिएसी)—इसकी पहचान
इसके बैंगनी (Purple) रंग से हो जाती है ।
(४) Andrographis paniculata Nees (Fam. Acanthaceae–(अॅकेन्थेन्सी) (अंड्रोग्राफिस् पॅनिक्युलॅटा)–
हि० कालमेघ ।
इसके कांड हरे, अनेक सीधी, पतली विपरीत शाखाएँ एवं पत्र भालाकार और हरे होते हैं जिससे इसका भेद किया
जा सकता है । देशी चिरायता के नाम से यह बजार में बिकता है ।
अथेन्द्रयवस्य नामगुणानाह
उक्तं कुटजबीजं तु यवमिन्द्रयवं तथा । कलिङ्गं चापि कालिङ्गं तथा भद्रयवा अपि ।। १५६ ।।
२१ भाव.I.,
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