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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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हरीतक्यादिवर्गः २६५
(६) इसका सत्त्व रब्बेसूस, जो काले रंग का तथा मीठा होता है का व्यवहार खाँसी एवं गले की तकलीफ आदि
में चूसने के लिए किया जाता है।
(७) सुश्रुत में 'सर्वोपघातशमनीय' योग में इसका अन्तर्भाव किया गया है। इस प्रकार सभी प्रकार के अभिघातों
से उत्पन्न लक्षणों में इसका प्रयोग उत्तम माना गया है।
(८) इसका उपयोग क्षतक्षीण, रक्तवमन, हृद्रोग एवं अपस्मार आदि में भी किया जाता है। दूध अथवा घृत और
मधु के साथ इसको देना चाहिये।
(९) घृत के साथ इसके कल्क का प्रयोग घावों पर लगाने के लिये उपयोगी है। भिलावे से यदि त्वक्शोथ हो
गया हो तो मुलेठी और तिल को दूध में पीस कर लेप करने से लाभ होता है।
मात्रा-चूर्ण-१/४ माशा।
अथ काम्पिल्लस्य नामगुणानाह
काम्पिल्लः कर्कशश्चन्द्रो रक्ताङ्गो रोचनोऽपि च॥
काम्पिल्लः कफपित्तास्रकृमिगुल्मोदरव्रणान्। हन्ति रेची कटूष्णाश्च मेहानाहविषाश्मनुत् ॥१४७॥
कबीला के नाम तथा गुण-काम्पिल्ल, कर्कश, चन्द्र, रक्ताङ्ग और रोचन ये नाम कबीला के हैं। कबीला-
कफ, रक्तपित्त, कृमि, गुल्म, उदररोग एवं व्रण (घाव) को दूर करता है। तथा यह रेचक (दस्तावर), कटु रस युक्त और
उष्णवीर्य है। एवं प्रमेह, आनाह, विष तथा पथरी को नष्ट करने वाला होता है। [१४७]
४४. कम्पिल्ल (कबीला)
हिं०-कबीला, कमीला, काम्बीला। बं०-कमिला, कमलागुरी। म०-शेन्द्रि कपिला। गु०-कपीलो। क०-
वसारे, चन्द्रहिट्टू। पं०-कमल। ते०-कुम्कुम। ता०-कपिला रङ्ग, कपिला पोडि। मला०-पोनागम। फा०-
कम्बिलाय, कमीलह, कम्बेला। अ०-कम्बील, किम्बील, वार्स। अं०-Kamala (कमला)। ले०-Mallotus
philippinensis, Muell-Arg. (मॅल्लोटस् फिलिपाइनेन्सिस, मुएल-आर्ग.)। Fam. Euphorbiaceae
(यूफोर्बिएसी)।
यह प्रायः सब गरम प्रान्तों में हिमालय पहाड़ के नीचे से पूरब की ओर सिन्ध से दक्षिण, बंगाल, ब्रह्मा, सिंगापुर,
सिलोन एवं मलाया द्वीप समूह आदि प्रान्तों में पाया जाता है।
इसका सदा हरित वृक्ष-मध्यमाकार का २५-३० फीट तक ऊँचा होता है। छाल-चौथाई इंच मोटी, खाकी
रङ्ग की फटी सी और भीतर से लाल दिखाई पड़ती है। पत्ते-गूलर के पत्तों के समान ३ से ९ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार,
नोकदार, विषमवर्ती और निम्न पृष्ठ रोमश रक्ताभ होते हैं। कार्तिक से पूस तक फूल, फल आते हैं और उष्णकाल में
फल पकते हैं। फूल-छोटे-छोटे भूरापन युक्त लाल रङ्ग के आते हैं। फल-त्रिदल आकार में झरबेर के समान और
पकने पर लाल रवेदार रज से ढका रहता है। इसी लाल रज को कबीला कहते हैं। बीज-चिकने, गोल और काले
होते हैं।
'कबीला वायविडङ्ग की रज का नाम है' यह कहना भ्रमात्मक है। कबीला के बीजों को कहीं-कहीं वायविडङ्ग की
जगह व्यवहार में लाते हैं जो अनुचित है। वास्तव में वायविडङ्ग और कबीले के वृक्ष एक नहीं, दो भिन्न-भिन्न हैं।
इस वृक्ष के फलों के ऊपर के पराग (ग्रन्थि तथा रोम) को कबीला कहते हैं। फल पक जाने पर उनको कपड़े
में डालकर अथवा हाथ से रगड़ कर इसे अलग करते हैं। इस लाल बदामी रंग की बुकनी में न तो स्वाद होता है न