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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 1167 में से

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हरीतक्यादिवर्गः २३१
(२) अजीर्ण और अग्निमांद्य में सैन्धव के साथ इसको दिया जाता है। यह ग्राही है तथा इससे उदरशूल दूर होता
है।
(३) बस्ति पीड़ा, बस्ति शोथ तथा लसिकामेह (Chyluria) एवं मूत्र स्वच्छ न होने पर इसका क्वाथ मधु और
सिरके के साथ दिया जाता है।
(४) चर्मरोग जैसे दाद, खुजली आदि में यह बहुत लाभदायी है।
(५) अग्निदग्ध व्रण पर इसका स्वरस घी के साथ लगाते हैं।
(६) सन्धिशोथ आदि में इसको रेंडी के तेल के साथ पीसकर लगाते हैं तथा इसका क्वाथ पीने को देते हैं।
(७) इसकी चटनी दृष्टि के लिये उपयोगी है।
(८) इसका धूपनार्थ प्रयोग करने से हवा शुद्ध होती है।
मात्रा—चूर्ण-१/८ से १/४ तोला। तेल-१ से ३ बूँद।
अथ पारसीकयवानीगुणानाह
पारसीकयवानी तु यवानीसदृशी गुणः। विशेषात्पाचनी रुच्या ग्राहिणी मादिनी गुरुः ॥८०॥
खुरासानी अजवायन के गुण—पारसीकयवानी अर्थात् खुरसानी अजवाइन का भी गुण अजवाइन के समान ही
जानना चाहिये। किन्तु विशेषता यह है कि यह पाचक, रुचिकारक, ग्राही, मादक तथा परिपाक में गुरु होती है। [८०]
१८. पारसीक यवानी
हिं०—खुरासानी अजवायन, खुरासानी अजवाइन, खुरसाना। बं०—खुरसानी अजोवान। म०—खुरासानी ओंवा,
खुरासाण ओंवा। गु०—खुरासाणी अजमो, छुहारी अजमोद। ते०—कुरासानी वाम। ता०—कुरासानी योमाम। पं०—
खुरासानी अजवाइन, बजरुल। मा०—खुरासानी अजवाण। क०—खुरासानी वोभं। फा०—तुख्म वङ्गे, वङ्गदिवाना,
वङ्ग, तुख्मविनग, तुख्मेवंग। अ०—वज़रुल वङ्ग, अवीद शिकरान, वजुलवङ्ग, बजरुल विनग। यू०—अजवायनी
खुरसानी। अं०—Henbane (हेनबेन)। ले०—Hyoscyamus niger, Linn. (हायोसायामस् नाइगर लिन)।
Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)।
खुरासानी अजवायन केवल खुरासान देश में ही नहीं बल्कि इसके छोटे छोटे क्षुप योरप और मध्य एशिया के कई
प्रान्तों के जङ्गलों तथा कूड़ों के ढेर पर उगे हुए रहते हैं। हमारे देश में पश्चिम हिमालय के गरम प्रान्तों में काश्मीर से
गढ़वाल तक पाये जाते हैं और सहारनपुर, पूना, आगरा और अजमेर के आस पास के कितने ही स्थानों में इसकी खेती
की जाती है।
इसकी अन्य जातियाँ H. reticulatus (हा. रेटिक्यूलैटस), तथा H. muticus (हा. म्यूटिकस-कोहीभंग) होती
हैं। H. muticus (हा. म्यूटिकस) अधिक विषैली होती है तथा यह पश्चिमी पञ्जाब और सिन्ध के जङ्गली प्रदेशों तथा
नदियों के किनारों पर उत्पन्न होती है एवं हा. रेटिक्युलेटस् वलुचिस्तान में होती है। इसका पौधा—सीधा, रोमश,
चिपचिपा, उग्रगंधयुक्त एवं १-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते—धतूरे के समान, कुछ कटे किनारेवाले, दन्तुर, नीचे के सवृन्त
आयताकार, अंडाकार किन्तु ऊपर के अवृन्त अंडाकार होते हैं। पुष्प—पीले रंग के, पाँच पंखड़ीवाले और आकार में
तमाखू के फूलों के समान होते हैं तथा उन पर जामुनी रेखायें होती हैं। फल—अंडाकार, १/२ इंच व्यास के एवं दो
खण्डों में विभक्त होते हैं। बीज—भूरे, धूसर, चिपटे, वृक्काकार या घोंघा की तरह, १.५-१.७५×१-१.२×०.५-०.७
मि० मि० बड़े, धारीदार, गंधहीन एवं अल्पतिक्त होते हैं।