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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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२१० भावप्रकाशनिघण्टुः
को उत्पन्न करता है। इस विषय में हेतु विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है अर्थात् विचार करना व्यर्थ है क्योंकि
वह सब बातें प्रभाव से होती हैं न कि रसादि हेतुओं से, अम्ल और कटु रस पित्त वात का जनक होने पर भी आश्रय
विशेष में कर्म विशेष करने वाले होते हैं जैसे कि आँवला तथा बड़हर ये दोनों यद्यपि रसादिकों में तुल्य हैं किन्तु फल
खाने (गुणों) में तुल्य नहीं हैं। इसी भाँति हरड़ की त्रिदोषनाशकता के विषय में भी समझना चाहिये। [२३-२६]
अथ हरीतक्यां तद्रसादीनां स्थानान्याह
पथ्याया मज्जनि स्वादुः स्नात्वामम्लो व्यवस्थितः। वृन्ते तिक्तस्त्वचि कटूरस्थिस्थस्तुवरो रसः ।।२७।।
हरड़ में रसों के रहने के स्थान-हरड़ की मींगी में मधुर रस, रेशों में आम्लरस, वृन्त (ठेपी) में तिक्तरस, छिल्के
में कटु रस और गुठली में कषाय रस रहता है। [२७]
अथोत्तमहरीतक्या लक्षणान्याह
नवा स्निग्धा घना वृत्तागुर्वी क्षिप्ता च याऽम्भसि। निमज्जेत्सा प्रशस्ता चकथिताऽतिगुणप्रदा ।।२८।।
नवादिगुणयुक्तत्वं तथैवात्र द्विकर्षता। हरीतक्याः फले यत्र द्वयं तच्छ्रेष्ठमुच्यते ।।२९।।
उत्तम हरड़ के लक्षण-जो हरड़ नवीन, स्निग्ध, घन (ठोस), गोल और गुरु (वजनदार) हो तथा जल में डालने
पर डूब जाय वह उत्तम और अत्यन्त गुणकारी मानी जाती है। जिस हरीतकी के फल में पूर्वोक्त नूतनता आदि सम्पूर्ण
गुण हों एवं तौल भी उसका दो कर्ष अर्थात् दो बहेड़े के बराबर हो वह उत्तम कही जाती है। [२८-२९]
अथ हरीतक्याः प्रयोगभेदेन फलभेदानाह
चर्व्विता वर्द्धयत्यग्निं पेषिता मलशोधिनी। स्विन्ना संग्राहिणी पथ्या भृष्टा प्रोक्ता त्रिदोषनुत् ।।३०।।
उन्मीलिनी बुद्धिबलेन्द्रियाणां निर्मूलिनी पित्तकफानिलानाम्।
विस्रंसिनी मूत्रशकृन्मलानां हरीतकी स्यात् सह भोजनेन ।।३१।।
अन्नपानकृतान्दोषान्वात्पित्तकफोद्भवान् । हरीतकी हरत्याशु भुक्तस्योपरि योजिता ।।३२।।
लवणेन कफं हन्ति पित्तं हन्ति सशर्करा। घृतेन वातजान् रोगान्सर्वरोगान्गुडान्विता ।।३३।।
हरीतकी के प्रयोग भेद से गुण भेद-हरीतकी यदि चबा कर खाई जाय तो जठराग्नि की वृद्धि करती है,
शिला पर पीस कर खाई जाय तो मल शोधन करती है, उबाल कर खाई जाय तो मल रोकती है, भून कर खाई जाय
तो त्रिदोष को दूर करती है और भोजन के साथ सेवन करने से बुद्धि, बल तथा इन्द्रियों को विकसित करने वाली, पित्त,
कफ तथा वायु को नष्ट करने वाली एवं मूत्र, विष्ठा तथा मल पदार्थों का विरेचन करने वाली होती है। यदि वही
हरतकी भोजन कर चुकने के बाद ऊपर से खाई जाय तो अन्न तथा पान सम्बन्धी दोषों का एवं वात पित्त तथा कफ से
उत्पन्न होने वाले विकारों को शीघ्र हरने वाली होती है। सेंधा नमक के साथ खाने से कफ, शक्कर के साथ खाने से
पित्त, घृत के साथ खाने से वात सम्बन्धी रोग और गुड़ के साथ खाने से समस्त व्याधियों को दूर करने वाली होती
है। [३०-३३]
अथ रसायनगुणार्थिनां कृते हरीतकीप्रयोगविधिमाह
सिंधूत्थशर्कराशुण्ठीकणामधुगुडैः क्रमात्। वर्षादिष्वभया प्राश्या रसायनगुणैषिणा ।।३४।।
हरीतकी का रासायनिक प्रयोग-जो रसायन के गुणों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं उन्हें चाहिए कि वे
वर्षा आदि छः ऋतुओं में क्रम से सेंधानमक, शक्कर, सोंठ, पीपल, मधु और गुड़ के साथ हरीतकी का सेवन करें, अर्थात्
वर्षा ऋतु में सेंधानमक के साथ, शरद ऋतु में शक्कर के साथ, हेमन्त ऋतु में सोंठ के साथ, शिशिर ऋतु में पीपल