भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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तो उसे गतायु कहते हैं और जो दर्पण, जल वा धूप में अपने प्रतिबिम्ब को न देखता हो अथवा अपने प्रतिबिम्ब या छाया
को एक किसी अङ्ग से हीन या विकृति रूपवाली, या कुत्ता, कौवा, कङ्कपक्षी, गिद्ध, प्रेत, यक्ष और राक्षस की अथवा
इनसे अन्य किसी प्राणी की छाया के समान देखे तो यदि वह रोगी हो तो उस की मृत्यु निकट होती है और स्वस्थ हो
तो उसे शीघ्र रोग होने की संभावना रहती है ॥६७-७२॥
ह्रीश्रियौ नश्यतो यस्य तेन ओजः स्मृतिः प्रभा । अकस्माच्च भजन्ते यं स गतासुरसंशयम् ।।७३।।
अकस्मात् जिसकी लज्जा, शोभा, तेज, ओज, स्मरणशक्ति और प्रतिभा ये सब नष्ट हो जायँ या अकस्मात् ये सब
प्राप्त हो जावें तो उसे निःसन्देह गतायु समझना चाहिये ॥७३॥
❖ प्रभा=प्रतिभा ।।७३।।
यहाँ 'प्रभा' का 'प्रतिभा' अर्थ समझना चाहिये ।।७३।।
यस्याधरोष्ठः पतितः क्षिप्तोश्चोर्ध्वं तथोत्तरः । उभौ वा जाम्बवाभासौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ।।७४।।
आरक्ता दशना यस्य श्यावा वा स्युः पतन्ति वा । खञ्जनप्रतिभा१ वापि तं गतायुषमादिशेत् ।।७५।।
कृष्णा तथाऽनुलिप्ता च जिह्वा शून्या च यस्य वै । कर्कशा वा भवेद्यस्य सोऽचिराद्विजहात्यसून् ।।७६।।
जिसका नीचेवाला ओष्ठ नीचे को लटक जाय और ऊपर का ओष्ठ ऊपर की ओर उठ जाय अथवा जामुन के रङ्ग
का हो जाय तो उसका जीना दुर्लभ समझना चाहिये और जिसके सब दाँत लाल वर्ण तथा श्याव अर्थात् धूम्र वर्ण के
हो जायँ या गिर जायँ या खंजन पक्षी के तुल्य वर्ण के हो जायँ तो उसे गतायु समझना चाहिये और जिसकी जिह्वा काली
पड़ जाय या मल से लिपटी हुई तथा रस ग्रहण करने में सुख या कर्कश अर्थात् खुरदरी हो जाय तो वह बहुत शीघ्र
प्राणों को छोड़ता है (मर जाता है) ।।७४-७६।।
कुटिला स्फुटिता वाऽपि शुष्का वा यस्य नासिका । अवस्फूर्जति भग्ना वा स न जीवति मानवः ।।७७।।
जिसकी नाक टेढ़ी, फटी सूखी वा झुकी सी हो या श्वास के वेग से जोर शब्द करती हो तो वह मनुष्य नहीं जीता
है ॥७७॥
स्फूर्जति=श्वासवेगेनोच्चैः शब्दं करोतीत्यर्थः ।।७७।।
'स्फूर्जति' का 'श्वास के वेग से जोर शब्द करती हो' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७७॥
संक्षिप्ते विषमे स्तब्धे रूक्षे सास्त्रे च लोचने । स्यातां परिश्रुते यस्य स गतायुर्नरो ध्रुवम् ।।७८।।
जिसके दोनों नेत्र सङ्कुचित, विषम (छोटे बड़े), पथराये हुये, रूखे, आँसुओं से भरे अथवा आँसू गिरते हुये हों तो
निश्चय उस मनुष्य को गतायु समझना चाहिये ॥७८॥
केशाः सीमन्तिनो यस्य संक्षिप्ते विनते भ्रुवौ । लुठन्ति चाक्षिपक्ष्माणि सोऽचिराद्याति मृत्यवे ।।७९।।
जिसके बालों में कङ्घी से सँवारने के समान बीच में सीमन्त (माँग) बन जाय एवं दोनों भौंहें सिकुड़ी तथा झुकी
हुई हो जायँ या आँखों के ऊपर वे बप्ल (बरौनी) झड़ जायँ तो वह शीघ्र मृत्यु को प्राप्त करता है ॥७९॥
लुठन्ति=पतन्ति ।।७९।।
'लुठन्ति' का 'गिर जायँ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७९॥
१. 'प्रतिमे'