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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 1167 में से

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१७० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
क्योंकि दोष, काल तथा बल के अनुसार कभी-कभी ऐसी भी अवस्था उपस्थित हो जाती है कि उस समय शास्त्र
में कही हुई विधियाँ नहीं वर्ती जातीं किन्तु वर्जित विधि से ही काम ली जाती है ॥
विवर्जितं कर्म कर्तव्यं भवतीत्यर्थः ।।३१।।
‘विवर्जितं कर्म कर्तव्यं भवति’ अर्थात् वर्जित की हुई ‘विधियाँ’ की जाती हैं’ ।।३१।।
अथ चिकित्सायाः फलमाह-
क्वचिदर्थः क्वचिन्मैत्री क्वचिद्धर्मः क्वचिद्यशः । कर्माभ्यासः क्वचिच्चेति चिकित्सा नास्ति निष्फला ।।३२।।
आयुर्वेदोदितां युक्तिं कुर्वाणाश्च हिताय¹ ये । पुण्यायुर्वृद्धिसंयुक्ता नीरोगाश्च भवन्ति ते ।।३३।।
चिकित्सा करने से फल—चिकित्सा करने से कहीं धन, कहीं मित्रता, कहीं धर्म, कहीं यश और कहीं चिकित्सा
करने के अभ्यास का ही लाभ होता है। अत एव चिकित्सा कभी निष्फल नहीं होती। जो चिकित्सक केवल रोगों की
हित कामना से ही आयुर्वेदशास्त्र में कही हुई युक्तियों से चिकित्सा करते हैं उनके पुण्य तथा आयु की वृद्धि होती है और
वे नीरोग भी होते हैं ।।३२/३३।।
अथ धनिभ्योऽर्थग्रहणं वैद्यानां समुचितमित्याह-
नैव कुर्वीत लोभेन चिकित्सापुण्यविक्रयम् । ईश्वराणां वसुमतां लिप्सेतार्थं तु वृत्तये ।।३४।।
धनियों से धन लेकर चिकित्सा का विधान—लोभ से धन लेकर चिकित्सा करने से उत्पन्न हुये महान् पुण्य
का विक्रय न करे, किन्तु यदि जीवन निर्वाह के लिये धन लेना पड़े तो धनवान् तथा सामर्थ्यशाली से धन ग्रहण करने
की इच्छा करे किन्तु गरीबों से धन न लेवे ।।३४।।
अथ निःशुल्ककारितचिकित्साफलमाह-
चिकित्सितं शरीरं यो न निष्क्रीणाति दुर्मतिः । स यत्करोति सुकृतं सर्वं तद्भिषगश्नुते ।।३५।।
निःशुल्क चिकित्सा कराने में दोष—जो मूढ़ रोगी आरोग्य लाभ करने के पश्चात् चिकित्सक को धनादि नहीं
देता वह जो कुछ पुण्य करता है, सब वैद्य को मिल जाता है । (अतः वैद्य को शक्त्यनुसार अवश्य कुछ देकर चिकित्सा
करानी चाहिये) ।।३५।।
अथ वैद्यवृत्तिः सर्वत्र सुसिद्धेत्याह-
न देशो मनुजैर्हीनो न मनुष्या निरामयाः । ततः सर्वत्र वैद्यानां सुसिद्धा एव वृत्तयः ।।३६।।
वैद्य की चिकित्सा वृद्धि का प्रसार—कोई देश मनुष्यों से हीन नहीं है और कोई मनुष्य रोग से हीन नहीं है
अतः सर्वत्र वैद्यों की वृत्ति (आजीविका) सर्वथा सिद्ध (बनी बनाई) है ।।३६।।
अथ चिकित्साया अङ्गान्याह-
रोगी दूतो भिषग्दीर्घमायुर्द्रव्यं सुसेवकः । सदौषधं चिकित्साया इत्यङ्गानि बुधा जगुः ।।३७।।
चिकित्सा के अङ्ग—(१) रोगी, (२) दूत, (३) वैद्य, (४) दीर्घ आयु, (५) द्रव्य, (६) सुन्दर सेवक और (७)
उत्तम औषध इन सबों को चिकित्सा का अङ्ग कहा है अर्थात् बिना इनके चिकित्सा नहीं हो सकती ।।३७।।


१. 'विहिताश्चै'ति पाठा. ।