भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
न छूटे और देखने में पाण्डुर (पीत मिश्रित शुक्ल) वर्ण का हो तथा पतला और शीतल हो उसे शुद्ध समझना
चाहिये ॥२३॥
धात्रीलक्षणमाह-
पीताय यदि बालस्य विदध्यादुपमातरम्। सुविचार्य गुणान्दोषान्कुर्याद्धात्रीं तदेदृशीम् ॥२४॥
सवर्णां मध्यवयसां सच्छीलां मुदितां सदा। शुद्धदुग्धां बहुक्षीरां सवत्सामतिवत्सलाम् ॥२५॥
स्वाधीनामल्पसन्तुष्टां कुलीनां सज्जनात्मजाम्। कैतवेन परित्यक्तां निजपुत्रशदृशं शिशौ ॥२६॥
धात्री के लक्षण—बालक को दूध पिलाने के लिये यदि उपमाता (धाई) रखी जाय तो उसके गुण-दोषों को भली-
भाँति विचार कर ऐसी धाई रखे जो अपनी जाति की हो तथा मध्य अवस्था वाली, सुशीला, सदा प्रसन्न चित्त रहनेवाली,
शुद्ध तथा अधिक दूधवाली, पुत्र से युक्त, बालकों पर अत्यन्त प्रेम रखनेवाली, अपने अधीन रहनेवाली, अल्प द्रव्यादि
देने से भी सन्तुष्ट रहनेवाली, अच्छे कुल में उत्पन्न हुई, सज्जन की पुत्री, कपट से रहित तथा बालक को अपने पुत्र ही
की भाँति देखनेवाली हो ॥२४-२६॥
अथ निषिद्धां धात्रीमाह-
शोकाकुलाक्षुधार्ता च श्रान्ताव्याधिमती सदा। अत्युच्चा नितरां नीचा स्थूलातीव भृशं कृशा ॥२७॥
गर्भिणी ज्वरिणी चापि लम्बोन्नतपयोधरा। अजीर्णभोजिनी चापि तथा पथ्यविवर्जिता ॥२८॥
आसक्ता क्षुद्रकार्येषु दुःखार्ता चञ्चलाऽपि च। एतासां स्तन्यपानेन शिशुर्भवति सामयः ॥२९॥
दूध पिलाने के अयोग्य धात्री के लक्षण—शोक से व्याकुल चित्तवाली, भूख से पीड़ित, थकी हुई, सदा रोग
से घिरी हुई, अत्यन्त लम्बी, अत्यन्त नीची, अत्यन्त मोटी, अत्यन्त दुबली, गर्भिणी, ज्वर से युक्त, लम्बे तथा ऊँचे
स्तनोंवाली, अजीर्ण होने पर भी भोजन करने वाली, कुपथ्य भोजनादि सेवन करनेवाली, क्षुद्र (नीच) कार्यों के
करने में आसक्त चित्त वाली, दुःख से पीड़ित और चञ्चल चित्तवाली ऐसी धाइयों के दूध पीने से बालक रोगी हो जाता
है ॥२७-२९॥
अथ बालस्य स्तन्यपानविधिमाह-
तत्र माता प्रशस्ताङ्गी चारुवस्त्रा पुरोमुखी। उपविश्यासने सम्यग्दक्षिणं स्तनमम्बुना ॥३०॥
प्रक्षाल्येषत्परिस्राव्य मन्त्राभ्यामभिमन्त्रितम्। उदङ्मुखं शिशुं क्रोडे शनैः सन्धाय पाययेत् ॥३१॥
बालकों को दूध पिलाने की विधि—बालक को दूध पिलाने के समय माता या धाई जो कोई हो वह अपने अङ्गों
को स्नानादि से स्वच्छ सुन्दर वस्त्र पहने पूर्व की ओर मुख करके अच्छी तरह से आसन पर बैठे और प्रथम दक्षिण स्तन
को जल से खूब धोकर थोड़ा सा दूध उसमें से निकाल कर फेंक दे। उसके बाद आगे लिखे हुये दो मन्त्रों से स्तन को
अभिमन्त्रित करके बालक का मुख गोदी में उत्तर ओर रखकर धीरे से उसके मुख में स्तन देकर दूध पिलावे ॥३०-३१॥
❖ माता=इत्युपलक्षणम्। धात्री चेष्परिस्राव्य ॥३१॥
“माता' यह उपलक्षण है। अतएव धात्री को भी उचित है कि—दूध पिलाने के समय स्तन को धोकर उससे थोड़ा
सा दूध निकाल कर फेंक देवे ॥३१॥
अन्यथा वैगुण्यमाह सुश्रुतः-
अस्रावितं स्तनं बालः पिबन्स्तन्येन भूयसा। पूर्णस्रोता वमीकासश्वासैर्भवति पीडितः ॥३२॥
अविधि स्तनपान कराने का दोष—यदि दूध पिलाने के पहले स्तन से कुछ दूध निकाल कर बिना फेंके ही
उसको बालक पीवे तो अधिक दूध मुख में चले जाने के कारण मुख में ऊपर का स्रोत भर जाने से बालक वमन, कास
और श्वासरोग से पीड़ित होता है ॥३२॥