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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 139

८६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
❖ अथावभासिनी-भ्राजकेन पित्तेनावभासनात् । परिणाहेन विस्तारितस्य व्रीहे (२विंशतिभागेष्व)
द्वादशो भागःप्रमाणं यस्याः । व्रीहिरत्रयवः, सा सिध्मपद्मकण्टकयोरधिष्ठानम् ।।
त्वचा का जो 'अवभासिनी' नाम है वह भ्राजक नामक पित्त से अवभासित (दीप्त) होने से ही है। परिणाह अर्थात्
चौड़ाई में फैलाये हुये व्रीहि का (जब की चौड़ाई का) बीस भाग करने पर उनमें से केवल १८ भागों को मिला कर जितनी
चौड़ाई होती है उतने प्रमाण इस त्वचा की मुटाई होती है। यहाँ पर 'व्रीहि' इस पद से जब नामक अन्न का ग्रहण करना
चाहिये । यह केवल 'सिध्म' उत्पन्न होने का स्थान नहीं है, बल्कि 'सिध्म' और 'पद्मकण्टक' दोनों ही का उत्पत्तिस्थान
है।
द्वितीया लोहिता ज्ञेया तिलकालकजन्मभूः ।।२८०।।
दूसरी त्वचा का नाम 'लोहिता' है यह 'तिलकालक' का उत्पत्तिस्थान है ।।२८०।।
❖ द्वितीया यवषोडशभागप्रमाणा तिलकालकन्यच्छव्यङ्गानामधिष्ठानम् ।।२८०।।
दूसरी त्वचा की मुटाई जौ की चौड़ाई के २० भागों में से १६ भागों के बराबर होती है। यह केवल तिलकालक
का ही नहीं किन्तु न्यच्छ और व्यङ्ग (झाईं) रोगों का भी उत्पत्तिस्थान है ।।२८०।।
तृतीया तु भवेच्छ्वेता स्थानं चर्मदलस्य सा ।।२८१।।
तीसरी त्वचा श्वेता नाम की होती है जो चर्मदल नामक रोग का उत्पत्तिस्थान है ।।२८१।।
❖ सा यवद्वादशभागप्रमाणा चर्मदलाजगल्लिकामशकानामधिष्ठानम् ।।२८१।।
तीसरी त्वचा की मुटाई जब की चौड़ाई के २० भागों में से १२ भागों के बराबर होती है और वह केवल चर्मदल
का ही नहीं, किन्तु अजगल्लिका और मस्सा का भी उत्पत्तिस्थान है ।।२८१।।
ताम्रा चतुर्थी विज्ञेया किलाश्वित्रभूमिका ।।२८२।।
चौथी त्वचा का नाम ताम्रा है, वह किलास तथा श्वित्र नामक कोढ़ का उत्पत्तिस्थान है ।।२८२।।
चतुर्थी यवाष्टभागप्रमाणा ।।२८२।।
चौथी त्वचा की मुटाई जब की चौड़ाई के बीस भागों में से ८ भागों के बराबर होती है ।।२८२।।
पञ्चमी१ वेदिनी नाम्ना पञ्चभागप्रमाणिका । विसर्पकुष्ठाधिष्ठाना ज्ञेया षष्ठी तु रोहिणी ।। विख्याता
रोहिणी षष्ठी ग्रन्थिगण्डापचीस्थितिः ।।२८३।।
पाँचवीं त्वचा वेदिनी नाम की होती है। इसकी मुटाई जौ की चौड़ाई के २० भागों में से पाँच भागों के बराबर
होती है। यह विसर्प तथा कुष्ठों का उत्पत्तिस्थान है। छठी त्वचा रोहिणी नाम से प्रसिद्ध है, यह गाँठ, अपची और
गलगण्ड रोग का उत्पत्तिस्थान है ।।२८३।।
❖ २व्रीहिमात्रप्रमाणा सा रोहिणी ग्रन्थ्यपचीगलगण्ड (३गण्ड) मालाऽर्बुदश्लीपदानाम्धिष्ठानम् ।।२८३।।
'रोहिणी' नाम की जो छठीं त्वचा है, उसकी मुटाई एक जौ की चौड़ाई के बराबर है। वह केवल गाँठ, अपची
और गलगण्ड का ही नहीं किन्तु गण्डमाला, अर्बुद और श्लीपद रोग का भी उत्पत्तिस्थान है ।।२८३।।
१. एतत्कोष्ठस्थपाठस्थाने क्वचित् 'पञ्चमी वेदिनी नाम्ना सर्वकुष्ठोद्भवा तु सा। विख्याता रोहिणी षष्ठी ग्रन्थिगण्डापचीस्थितिः'
उति पाठो लभ्यते।
२. 'सा पञ्चमी वेदिनी यवपञ्चभागप्रमाणिका। सा षष्ठी रोहिणी व्रीहिप्रमाणे'ति पाठान्तरम्।
३. क्वचिन्नाप्युपलभ्यते कोष्ठस्थः पाठः।