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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

८२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
(तिर्यग्गताः १प्राह-)
तिर्यग्गतानां तु चतसृणामेकैका शतधा सहस्रधा चोत्तरोत्तरं विभज्यते । तास्तु असंख्येयास्ताभिरिदं शरीरं
गवाक्षितम्, निबद्धमायतम्, गवाक्षवद् निबद्धमायतम् । गवाक्षो=वातायनम्, यथा गवाक्षे बहूनि छिद्राणि
भवन्ति तथाऽस्मिन् देहे जालवद् शिरा व्याप्य तिष्ठन्तीति भावः । निबद्धमायतं गवाक्षितम् ।
२गवाक्षाकाररन्ध्रनिकरयुक्तं कृतमित्यर्थः । तासां मुखानि रोमलग्नानि यैर्मुखैः स्वेदः स्रवति रसश्चाभिसन्तर्पयन्ति
अन्तर्बहिश्च । तैरवाभ्यङ्गपरिषेकावगाहनालेपनवीर्याणि त्वचि पक्वानि अन्तः प्रवेशयन्ति । तैरेव स्पर्शं शुभमशुभं
वा गृह्णन्ति ।।२६४।।
तिर्यग्गत धमनियाँ—तिर्यग्गत चार धमनियों में हर एक में से उत्तरोत्तर विभक्त हो कर सैकड़ों, हजारों धमनियाँ
हो जाती हैं, अतः उनकी संख्या नहीं हो सकती । उन्हीं असंख्य धमनियों से मनुष्यादि का यह शरीर गवाक्ष (हवा आने
की जालीदार खिड़की) की भाँति सर्वत्र निबद्ध अर्थात् भर रहा है । यहाँ पर मूल में 'गवाक्षितं निबद्धमायतञ्च' यह जो लिखा
है उसका अर्थ यह है कि 'गवाक्ष की भाँति बहुत दूर में अर्थात् सर्वत्र निबद्ध (भर रहा) है' । इसका भाव यह है कि 'गवाक्ष'
(हवा के आने जाने की खिड़की) में जैसे बहुत से छिद्र होते हैं, उसी भाँति इस शरीर में भी जाल की भाँति शिरायें सर्वत्र
व्याप्त होकर स्थित हैं अर्थात् जालीदार खिड़की की भाँति छिद्र समूहों से युक्त हो रहा है । उन्हीं असंख्य शिराओं के मुख
प्रत्येक रोमों के साथ लगे हुए हैं अत एव जो स्वेद (पसीना) निकलता है वह उन्हीं असंख्य शिराओं के मुख से ही
निकलता है तथा उन्हीं के द्वारा देहस्थित रस भीतर बाहर सर्वत्र पहुँच कर सन्तर्पण करता (सींचता) रहता है और उन्हीं
के द्वारा अभ्यङ्ग (तैलादि की मालिश करना), परिषेक (शीतल जलादिकों से सेचन करना), अवगाहन (स्नान करना) और
आलेपन (चन्दनादि का लेप करना) इन सबों के वीर्य (प्रभाव) त्वचा में जब परिपक्व हो जाते हैं तब शरीर के भीतर
प्रवेश करते हैं और उन्हों के द्वारा पुरुष शुभ (भला) अथवा अशुभ (बुरा) स्पर्श का ज्ञान प्राप्त करता है ।।२६४।।
यथा स्वभावतः खानि मृणालेषु विसेषु च । धमनीनां तथा खानि रसो यैरभितश्चरेत् ।।२६५।।
जिस प्रकार कमल के नाल तथा कन्दों में स्वभावतः बहुत से छिद्र होते हैं उसी प्रकार पूर्वोक्त धमनियों में भी छिद्र
होते हैं । जिनसे कि रस चारों तरफ सञ्चार करता करता है ।।२६५।।
पञ्चाभिभूतास्त्वथ पञ्चकृत्वः पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयन्ति ।
पञ्चेन्द्रियं पञ्चसु भावयित्वा पञ्चत्वमायान्ति विनाशकाले ।।२६६।।
पञ्चभूतात्मक धमनियाँ पाँच इन्द्रियों से विशिष्ट जीवात्मा को श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों के अधिष्ठानों में संयोजित करती
हैं अर्थात् क्रमानुसार प्रत्येक इन्द्रियों के अधिष्ठान में संयोजित करती हैं न कि एक ही समय में जीवात्मा को पाँचों इन्द्रियों
के अधिष्ठानों में संयोजित करती हैं । एवं श्रोत्रादि पाँच बुद्धीन्द्रियों और इनसे उपलक्षित हस्तादि पाँच कर्मेन्द्रियों को तथा
ज्ञानेन्द्रिय और बुद्धीन्द्रिय संज्ञक मन को भी पृथिव्यादि सम्बन्धी पाँच बुद्धीन्द्रियों के गन्धादि विषयों में और उनमें उपलक्षित
हस्तादि पाँच कर्मेन्द्रियों के विषयों में तथा मन के विषय मन्तव्य अर्थात् सभी इन्द्रियों के विषयों के ज्ञान करने में संयोजित
करती हैं तथा प्राणविनाश होने के समय सभी धमनियाँ पञ्चत्व अर्थात् आकाशादि पञ्च महाभूतों के भाव को प्राप्त हो
जाती हैं । इसका भाव यह है कि—धमनियों की ही सहायता से जीवात्मा क्रम से श्रोत्रादि प्रत्येक इन्द्रियों के अधिष्ठानों
का आश्रय लेता है तथा उसके आश्रय लेने के बाद वे ही इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में संयोजित होती हैं यह प्रकृतावस्था
की दशा है, विकृतावस्था में अपने-अपने महाभूतों के रूप में मिल जाती हैं ।।२६६।।
१. कोष्ठस्यः पाठः क्वाचित्कः । २. 'गवाक्षाकारान्त्रे'ति पा. ।