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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1127

तथा मात्राशितीयेऽध्याये रक्तशालिषष्टिकयवगोधूमजाङ्गलमांसजीवन्तीशाकादिमोदकक्षीरादि, तथा यदोजस्करं
रसायनं वाजीकरणं सर्वदा शीलनीयत्वेन निर्दिष्टम् ।।५५।।
यहाँ 'रुचि' पद का 'शरीर की कान्ति' यह अर्थ समझना चाहिये। यहाँ यह जो शंका होती है कि 'दिन, रात्रि,
ऋतु तथा भोजन के प्रथम भागादि काल विशेष में स्वभावतः वातादि दोषों की वृद्धि हुआ ही करती है अतः दोषों की
समता कैसे हो सकती है' ? तो इसके समाधान में यह कहते हैं कि—दिन-रात्रि आदि के प्रथम आदि भागों में जिन-
जिन दोषों की वृद्धि होती है उस समय उन-उन दोषों को स्वस्थवृत्त में कही हुई विधियों से शान्त कर देने पर दोषों की
समता हो सकती है, अतः दोषों की समता होने में कोई दोष नहीं है। वैद्यों ने जो दोषों की समता कही है वह समता
स्वस्थता के बिना किसी अन्य हेतु से नहीं कही जा सकती है।
इससे यह सिद्ध हुआ कि—समदोष तथा स्वस्थ के लक्षण परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा रखने वाले होते हैं हैं
अर्थात् समदोष का लक्षण स्वस्थ के लक्षण की और स्वस्थ का लक्षण समदोष के लक्षण की अपेक्षा करता है, इन
दोनों में कोई निरपेक्ष नहीं है। अतएव जो मनुष्य स्वस्थ है वही समदोषों वाला और जो समदोषों वाला है वही स्वस्थ
कहलाता है।
जो अपने-अपने प्रमाण में स्थित-दोष धातु तथा मल को समभाव में रखने का हेतु (रखने वाला) है, और जो
रोग को नहीं उत्पन्न करने वाला एवं जो स्वस्थ रखने वाला है तथा जो ऋतुचर्याध्याय में सेवन करने के योग्य कहे हुये
हैं वे सब स्वस्थ पुरुषों के लिये हितकर होते हैं। 'मात्राशितीय अध्याय' में कहे हुये जो रक्तशालि (लाल जड़हन) तथा
साठी चावल, जौ, गेहूँ, जङ्गली जीवों का मांस, जीवन्ती शाक आदि तथा मोदक (लड्डू), दूध आदि हैं तथा जो ओज
को उत्पन्न करने वाले रसायन, वाजीकरण एवं सर्वदा सेवन करने योग्य कहे हुये हैं, वे सब स्वस्थ पुरुषों के लिये हितकर
होते हैं' यह और समझना चाहिये ॥५५॥
अथ/दोषधातुमलानां वृद्धेर्निदानान्याह-
तत्तद्वृद्धिकराहारविहारातिनिषेवणात् । दोषधातु मुलानां हि वृद्धिरुक्ता भिषग्वरैः ।।५६।।
दोष, धातु तथा मल वृद्धि के कारण-वैद्यवरों ने कहा है कि दोष, धातु तथा मल की वृद्धि वाले आहार तथा
विहार का अत्यन्त सेवन करने से दोषादि की वृद्धि हुआ करती है ॥५६॥
अथातिवृद्धानां तेषां लक्षणान्याह-
वाते वृद्धे भवेत्कार्श्यं पारुष्यं चोष्णकामिता । गाढं मलं बलञ्चाल्पं गात्रस्फूर्विनिद्रता ।
विण्मूत्रनेत्रगात्राणां पीतत्वं क्षीणमिन्द्रियम् । शीतेच्छातापमूर्च्छाःस्युः पित्ते वृद्धेऽल्पमूत्रता ।।५७।।
विडादिशौक्ल्यं शीतत्वं गौरवञ्चातिनिद्रता । सन्थिशैथिल्यमुत्क्लेदो मुखसेकः कफेऽधिके ।।५८।।
रसे वृद्धेऽन्नविद्वेषो जायते गात्रगौरवम् । लालाप्रसेकश्छर्दिश्च मूर्च्छा सादो भ्रमः कफः ।।५९।।
प्रवृद्धं रुधिरं कुर्याद् गात्रमारक्तवर्णकम् । लोचनञ्च तथा रक्तं सिराः पूर्य्यतेऽपि च ।।६०।।
अत्यन्त बढ़े हुए दोषादि के लक्षण-वायु की वृद्धि होने पर-शरीर की कृशता, कठोरता, गर्मी की इच्छा,
मल का गाढ़ा होना, बल की कमी, अङ्गों का फड़कना और नींद न आना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। पित्त की वृद्धि
होने पर-मल, मूत्र, नेत्र तथा शरीर का पीला होना, इन्द्रियों की क्षीणता, शीत की इच्छा, ताप, मूर्च्छा तथा मूत्र का
स्वल्प मात्रा में होना ये सब लक्षण होते हैं। कफ की वृद्धि होने पर-मल, मूत्र, नेत्र तथा शरीर का सफेद होना, शरीर
में शीतलता तथा गुरुता मालूम पड़ना, अत्यन्त निद्रा होना, सन्धिसथानों में शिथिलता, उत्क्लेद (वमन की इच्छा) और
मुख से पानी गिरना ये सब लक्षण होते हैं। रस की वृद्धि होने पर-अन्न से द्वेष होना, शरीर में गुरुता, लार गिरना;