भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1114, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् ।।७।।
अथ चिकित्सार्थं रोगिणो वाग्भटोक्तपरीक्षामाह-
दर्शनस्पर्शनप्रश्नैस्तं परीक्षेत रोगिणम्। आयुरादि दृशा स्पर्शाच्छीतादि प्रश्नतः परम् ।।१।।
वाग्भटोक्त रोगी की परीक्षा-दर्शन (देखना), स्पर्श (छूना) और प्रश्न (पूछना) के द्वारा रोगी की परीक्षा करनी
चाहिये। इनमें दर्शन के द्वारा आयु आदि की, स्पर्शन के द्वारा शीतादि की तथा प्रश्न के द्वारा अन्य शेष विषयों की परीक्षा
करनी चाहिये ।।१।।
❖ आयुरादि=आदिशब्दात्साध्यत्वादि । दृशा=दर्शनेन, अत्र ‘सम्पदादिभ्यश्चे'ति भावे क्विप् । स्पर्शात्=स्पर्शन ।
शीतादि=शीतोष्णमृदुकठिनत्वादि, नाडीपरीक्षणं च । प्रश्नतः=उदरलाघवगौरवतृषाऽतृषाबुभुक्षाबलाऽबलादि ।।१।।
यहाँ 'आयुरादि' पद में पठित 'आदि' शब्द से रोग के साध्यत्व तथा असाध्यत्व आदि का भी बोध करना चाहिये
अर्थात् रोगी के मल-मूत्रादि तथा नेत्र, जिह्वा और मुखादि को देखकर आयु की तथा रोग के साध्यत्व-असाध्यत्व की
परीक्षा करनी चाहिये । 'दृशा' पद का 'दर्शन' द्वारा यह अर्थ समझना चाहिये । दृशिर् ('दृशि-प्रेक्षणे') धातु से
'सम्पदादिभ्यश्च' इस सूत्र से भाव में 'क्विप्' प्रत्यय करने से क्विप् का सर्वापहार लोप होकर प्रातिपदिक-संज्ञक दृश् शब्द
से टा विभक्ति होने पर 'दृशा' की सिद्धि होती है । 'स्पर्शात्' पद का 'स्पर्शन द्वारा' । 'शीतादि' पद का 'शीत या उष्ण,
मृदु (कोमल) या कठिन आदि एवं नाड़ी की परीक्षा करना' यह समझना चाहिये अर्थात् इन सबों की स्पर्शन द्वारा ही परीक्षा
होती है। 'प्रश्नतः' पद का 'पेट की लघुता तथा गुरुता, तृषा मालूम पड़ना या न मालूम पड़ना, भूख लगनी या न लगनी,
दुर्बलता या सबलता की प्रश्न द्वारा परीक्षा करनी चाहिये' यह अर्थ होता है ।।१।।
मिथ्यादृष्टा विकारा हि दुराख्यातास्तथैव च। तथा दुष्परिष्टाश्च मोहयेयुरिचिकित्सकान् ।।२।।
जो रोग यथार्थ रूप से नेत्रादि तथा नाड़ी आदि की परीक्षा करके नहीं देखे गये हैं तथा जिनका भलीभाँति रोगी के
तरफ से वर्णन न किया गया हो एवं जिनमें रोगी से पेट की गुरुता या लघुता आदि के विषय में वैद्य द्वारा प्रश्न न किया
गया हो तो ऐसे रोगी की चिकित्सा करने में वैद्यों को भ्रम हो जाता है। अतः भलीभाँति से देख, सुन तथा पूछ कर रोगी
की चिकित्सा करनी चाहिये ।।२।।
तत्र दर्शनं नेत्रजिह्वामूत्रादीनां कर्त्तव्यम् ।
इसमें प्रथम दर्शन (देखना) द्वारा जो परीक्षा की जाती है उसमें रोगी के नेत्र, जिह्वा तथा मूत्र आदि को देखकर परीक्षा
करनी चाहिये ।
तत्र नेत्रपरीक्षामाह-
नेत्रं स्यात्पवनाद्रूक्षं धूम्रवर्णं तथाऽरुणम्। कोटराग्तःप्रविष्टं च तथा स्तब्धबिलोकनम् ।।३।।
हरिद्राखण्डवर्णं वा रक्तं वा हरितं तथा। दीपद्वेषिसदाहञ्च नेत्रं स्यात्पित्तकोषतः ।।४।।
चक्षुर्बलासबाहुल्यात्स्निग्धं स्यात्सलिलप्लुतम् । तथा धवलवर्णञ्च ज्योतिर्हीनं बलान्वितम् ।।५।।
नेत्रं द्विदोषबाहुल्यात्स्याद्दोषद्वयलक्षणम्। त्रिदोषलिङ्गसङ्गेन तं मारयति रोगिणम् ।।६।।
त्रिदोषदूषितं नेत्रमन्तर्मग्नं भृशं भवेत् । त्रिलिङ्गं सलिलस्रावि प्रान्तेनोन्मीलयत्यपि ।।७।।
नेत्र की परीक्षा-यदि वायु का प्रकोप हो तो रोगी के नेत्र रूक्षं, धूयें के समान वर्ण वाले तथा लाल, भीतर के
तरफ घुसे हुये, स्तब्ध स्वरूप से देखने वाले होते हैं और यदि पित्त का प्रकोप हो तो नेत्र हरदी के टुकड़ों के सदृश
पीले वर्ण या रक्त वर्ण वा हरे रंग के होते हैं एवं दीपक की तरफ न देख सकने वाले अर्थात् विशेष प्रकाश को न सह
सकने वाले तथा दाह युक्त होते हैं एवं कफ की अधिकता हो तो नेत्र स्निग्ध, जल से व्याप्त, सफेद रंग के, तेज से
रहित तथा दृढ़ता युक्त होते हैं।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA