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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1108

अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५७
होता है वह लेखन अञ्जन कहलाता है । यह अञ्जन नेत्रों में, पलकों में, सिराओं में, कान में और कपाल की हड्डी में
स्थित दोषों को स्थान से गिरा कर मुख, नाक और नेत्रों से निकाल देता है । कषाय, कटु रस वाला और स्नेहयुक्त जो
अञ्जन होता हैं; वह रोपण कहलाता है । यह स्नेह-स्निग्ध तथा शीतल होने के कारण वर्ण को उत्तम करता है और दृष्टि
के बल को बढ़ाता है । मधुर रस वाला तथा स्नेहयुक्त जो अञ्जन होता है वह प्रसादन कहलाता है । स्नेहन अञ्जन दृष्टि-
दोष को शुद्ध करने के लिये तथा दृष्टि को स्निग्ध करने के लिये उपयोगी है । लेखनी वर्त्ति एक मटर के बराबर और
रोपणी वर्त्ति डेढ़ मटर के बराबर तथा स्नेहनी वर्त्ति दो मटर के बराबर बनानी चाहिये ।।१९८-२०३।।
रसाञ्जनस्य मात्रा तु पिष्टवर्त्तिमिता मता । चूर्णं तु लेखनं वैद्यैर्द्विशलाकं प्रदीयते ।।
रोपणं त्रिशलाकं स्याच्चतस्रः स्नेहनाञ्जने ।।२०४।।
रसरूप अञ्जन की मात्रा एक पिष्टवर्त्ति के बराबर बनानी चाहिये । यदि वैद्य को लेखन चूर्ण आँजना हो तो दो सलाई
आँजना चाहिये । रोपण चूर्ण तीन सलाई और स्नेहन चूर्ण चार सलाई आँजना चाहिये ।।२०४।।
❖ चतस्रः शलाकाः स्नेहनाञ्जने चूर्णे ।।२०४।।
यहाँ 'चतस्रः स्नेहनाञ्जने' पदों का 'स्नेहन चूर्ण चार सलाई आँजनी चाहिये' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२०४।।
मुखयोर्मुकुलाकारा कलायपरिमण्डला । अष्टाङ्गुला शलाका स्यादश्मजा धातुजाऽथ वा ।।२०५।।
अञ्जन लगाने की सलाई-दोनों सिरों में कली के समान आकार वाली, आगे के भाग में मटर के समान गोल,
आठ अंगुल लम्बी, पत्थर की या धातु की होनी चाहिये ।।२०५।।
❖ कलायपरिमण्डला=अग्रे कलायवद्वर्त्तुला ।।२०५।।
यहाँ 'कलायपरिमण्डला' पद का 'आगे के भाग में मटर के समान गोल' यह अर्थ करना चाहिये ।।२०५।।
ताम्रलोहाश्मसञ्जाता शलाका लेखने मता । सुवर्णरजतोद्भूता स्नेहने समुदाहृता ।।२०६।।
अङ्गुली च मृदुत्वेन रोपणे सम्प्रयुज्यते । कृष्णभागावधिं लिम्पेदपाङ्गं यावदञ्जनम् ।।२०७।।
हेमन्ते शिशिरे चैव मध्याह्नेऽञ्जनमिष्यते । पूर्वाह्ने वाऽपराह्ने वा ग्रीष्मे शरदि चेष्यते ।।२०८।।
वर्षास्वनभ्रे नात्युष्णे वसन्ते तु सदैव हि । अथ वा सर्वदा प्रातः सायं वाऽञ्जनमाचरेत् ।।२०९।।
नातिशीतोष्णवाताभ्रवेलायां तत्प्रयुज्यते । श्रान्तेऽथ रुदिते भीते पीतमद्ये नवज्वरे ।।२१०।।
अजीर्णे वेगघाते च नाञ्जनं सम्प्रयुज्यते । रागोपदेहौ तिमिरं शूलं संरम्भमेव च ।।२११।।
निद्राक्षयञ्च कुरुते निषिद्धे युक्तमञ्जनम् ।।२१२।।
यदि लेखन चूर्ण लगाना हो तो ताँबे की या लोहे की अथवा पत्थर की सलाई होनी चाहिये । स्नेहन चूर्ण आँजना
हो तो सोने की अथवा चाँदी की सलाई होनी चाहिये । रोपण चूर्ण आँजना हो तो अंगुली से आँजना चाहिये क्योंकि अङ्गुली
कोमल होती है । अञ्जन लगाना हो तो काली पुतली के नीचे से नेत्र के कोने तक आँजे । हेमन्त और शिशिर ऋतु में
मध्याह्न के समय अञ्जन आँजना चाहिये । ग्रीष्म ऋतु और शरद् ऋतु में पूर्वाह्न समय अथवा अपराह्न समय में अञ्जन
आँजना चाहिये । वर्षा ऋतु में जिस समय बादल न हो और बहुत गरमी न हो उस समय आँजना चाहिये । वसन्त ऋतु
में जब इच्छा हो तब अञ्जन लगावे । अथवा सर्वदा प्रातः-सायं अञ्जन लगाना चाहिये । अत्यन्त शीतलता, उष्णता, वायु
तथा बादल के समय अञ्जन नहीं लगाना चाहिये । थका हुआ, रुदन किया हुआ, डरा हुआ, मदिरा पीया हुआ, नवीन
ज्वरवाला, अजीर्ण युक्त और जिसने मलमूत्र के वेग को रोका हो; इन सब को अञ्जन नहीं लगाना चाहिये । यदि उपर्युक्त
व्यक्ति अञ्जन लगायें तो उनके नेत्रों में लाली होती है, नेत्रों में सूजन आ जाती है, तिमिर, शूल तथा दोषों का कोप होता
है और निद्रा का नाश होता है ।।२०६-२१२।।
७० भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA