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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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पृष्ठ 1101

१०५० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
मर्दयेद् व्रणवक्त्रञ्च तेन रक्तं प्रवर्त्तते । तस्मान्न शीते नात्युष्णो नास्विन्ने नातितापिते ।।१३८।।
पीत्वा यवागूं तृप्तस्य स्रावयेच्छोणितं बुधः । अतिस्विन्नस्योष्णकाले तथैवातिसिराव्यधात् ।।१३९।।
अतिप्रवर्त्तते रक्तं तत्र कुर्यात्प्रतिक्रियाम् । अतिप्रवृत्ते रक्ते तु लोध्रसर्जरसाञ्जनैः ।।१४०।।
यवगोधूमचूर्णैश्च धवधन्वनगैरिकैः । सर्पनिर्मोकचूर्णैर्वा भस्मना क्षौमवस्त्रयोः ।।१४१।।
मुखं व्रणस्य बद्ध्वा च शीतैश्चोपचरेद् व्रणम् । विध्येदूर्ध्वसिरां तावद्दहेत्क्षारेण वह्निना ।।१४२।।
व्रणं कषायः सन्धत्ते रक्तं स्कन्धयते हिमम् । व्रणास्यं पाचयेत्क्षारो दाहः सङ्कोचयेत्सिराः ।।१४३।।
रक्ते दुष्टेऽवशिष्टेऽपि व्याधिर्नैव प्रकुप्यति । अतो रक्षेत्सावशेषं रक्ते नातिस्रुतिर्हिता ।।१४४।।
इन सब रोगों में यदि रक्त निकालना अत्यन्त आवश्यक हो तो जोंक के द्वारा ही निकालना चाहिये । विष से युक्त
रोगी को भी सिरामोक्षण करना उचित नहीं है । विद्वान् वैद्य को उचित है कि वह वात, पित्त तथा कफ से दूषित रुधिर
को क्रम से गौ के सींग, जोंक तथा तुम्बी; इन तीन साधनों से निकाले । दो दोषों से या तीन दोषों से यदि रुधिर दूषित
हो तो उसे युक्तिपूर्वक गौ के सींग आदि से या सिरामोक्षण से या पछना लगाने के द्वारा निकाल दे । सींगी-बलपूर्वक
१० अङ्गुल तक का रक्त खींच लेती है, जोंक-एक हाथ तक का, तुम्बी-१२ अङ्गुल तक का, पछना-लगाना-एक
अङ्गुल तक का एवं सिरामोक्षण-सर्वाङ्ग का रक्त निकाल कर शुद्ध करता है । शीतकाल में तथा अन्न भोजन न करने
पर रक्तस्राव भलीभाँति नहीं होता है । मूर्च्छा, निद्रा, भय, मद तथा श्रम से युक्त होने पर या मल तथा मूत्र के वेग का
अवरोध होने पर भी रुधिरस्राव भलीभाँति नहीं होता है । ऐसी अवस्था में कूट, सोंठ, पीपर, मरिच, सेंधा नमक का बारीक
चूर्ण घाव के मुख पर रगड़ देने से रक्तस्राव उत्तम रीति से होने लगता है । अतएव जब अत्यन्त शीत अथवा अत्यन्त
गर्मी पड़ती हो तब रक्तस्राव कराना उचित नहीं होता है । जिसे स्वेद न दिया गया हो तथा जिसका शरीर अत्यन्त तप्त
किया हो उसे भी रक्तस्राव कराना निषिद्ध है । रोगी को यवागू पिलाकर तृप्त कर चुकने के बाद बुद्धिमान वैद्य रक्त निकालना
प्रारम्भ करें । अत्यन्त स्वेदन जिसका हुआ हो या गर्मी की ऋतु हो अथवा अत्यन्त जिसके सिराओं का वेध हुआ हो अर्थात्
अधिक नस कटा हो उसे अत्यन्त रुधिर बहने लगता है, उस समय उसे रोकने के लिये उपाय करना चाहिये । उपाय-
अधिक रक्त का प्रवाह होने पर लोध, राल, रसौत के चूर्ण से वा जौ तथा गेहूँ के आटा से किंवा धाय, धामिन तथा
गेरू के चूर्ण से अथवा साँप की केंचुल के चूर्ण से या महीन सूती वस्त्र वा रेशमी वस्त्र के भस्म से व्रण के मुख को
रूँध कर शीतल उपचार करे । जिस सिरा से रक्त अधिक बह रहा हो उससे ऊपर की सिरा का पुनः वेध कर दे अर्थात्
काट दे अथवा रक्त निकलने वाले स्थान को क्षारद्वारा या अग्निद्वारा जला दे । बिधे हुये स्थान पर कषाय रसयुक्त ओषधि
का प्रयोग करने से व्रण का मुख बन्द हो जाता है । शीतल उपचार से रक्त जम जाता है । क्षार का प्रयोग करने से व्रण
का मुख पक जाता है । जलाने से सिराओं का मुख सङ्कुचित हो जाता है । यदि उक्त रीति से रक्त निकालने पर भी कुछ
दूषित रक्त अवशिष्ट रह जाय तो उससे व्याधि पुनः प्रकुपित नहीं हो सकती है, अतः दूषित रक्त का कुछ अवशिष्ट रहना
उचित ही होता है, क्योंकि अत्यन्त रक्त का निकलना हितकर नहीं होता ॥
अथातिस्रुतरक्तस्य दोषानाह-
आन्ध्यमाक्षेपकं तृष्णां तिमिरं शिरसो रुजः । पक्षाघातं श्वासकासौ हिक्कादाहौ च पाण्डुताम् ।।
कुरुतेऽतिस्रुतं रक्तं मरणं वा करोति च ।।१४५।।
अधिक रक्त निकलने के दोष-अधिक रक्त निकलने पर अन्धापन, आक्षेपकवात, प्यास, तिमिर रोग, सिर-
सम्बन्धी रोग, पक्षाघात, श्वास, हिचकी, दाह तथा पाण्डुरोग ये सब उत्पन्न होते हैं, अन्त में मृत्यु तक भी हो जाती
है ।।१४५।।
अथासृग्रक्षणे हेतुमाह-
देहस्योत्पत्तिरसृजा देहस्तेनैव धार्यते । रक्तं जीवस्य चाधारस्तस्माद्रक्षेदसृग्बुधः ।।१४६।।
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