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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1099

१०४८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
व्यभ्रे वर्षासु विध्येत शीते ग्रीष्मे शरद्यपि । मध्याह्ने शीतकाले च रुधिरं स्रावयेद् बुधः ।। १९१ ।।
अनुष्णाशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तञ्च वर्णतः । शोणितं गुरु विस्रं स्याद् विदाहश्चास्य पित्तवत् ।। १९२ ।।
विस्रता द्रवता रागश्चलनं विलयस्तथा । भूम्यादिपञ्चभूतानामेते रक्तेगुणाः स्मृताः ।। १९३ ।।
रक्ते दुष्टे भवेच्छोथो रक्तमण्डलमेव च । व्यथा दाहश्च पाकश्च कण्डूश्च पिडकोद्गमः ।। १९४ ।।
वृद्धे रक्ताङ्गनेत्रत्वं सिराणां पूर्णता तथा । गात्राणां गौरवं निद्रा मोहो दाहश्च जायते ।। १९५ ।।
शोणित स्राव (फस्त) की विधि-रोगी के रोग को देख कर तदनुसार एक प्रस्थ (६ ।। पल), आधा प्रस्थ
(३ । पल) अथवा चौथाई प्रस्थ (६ । तोला) रक्त निकाले । शरदृतु में मनुष्य को स्वभावतः रक्त निकलवाना चाहिये,
इससे रुधिरदोष से उत्पन्न हुये चर्म रोग, गाँठ, सूजन आदि विकार नष्ट हो जाते हैं । जिस दिन आकाश में बादल न हो,
वर्षाऋतु में, ग्रीष्मऋतु में, शरद् ऋतु में, मध्याह्न के समय और शीतकाल में विद्वान् वैद्य रोग तथा रोगी पर ध्यान देकर
रुधिर निकाले । रुधिर अनुष्णाशीत (उष्णता, शीतलता रहित), स्वाद में मधुर, वर्ण में लाल, भारी, चिकना, कच्चे मांस
के समान गन्धवाला तथा पित्त के सदृश दाहशक्ति वाला होता है । रुधिर में जो गन्ध है वह पृथिवी का गुण है, द्रवता
जल का गुण है, रक्तता तेज का गुण है, चलन वायु का गुण है और शब्द आकाश का गुण है इस प्रकार रक्त में पाँचों
महाभूतों के गुण हैं । रक्त के दुष्ट होने पर शोथ, लाल चकत्ते, शरीर में पीड़ा, दाह, शरीर का पक जाना, खुजली और
फुन्सियाँ होती हैं । शरीर में रक्त के बढ़ जाने पर अङ्ग तथा नेत्र लाल हो जाते हैं, सिरायें रक्त से भरकर फूल जाती हैं,
अङ्गों में भारीपन, निद्रा, मोह और दाह उत्पन्न होने लगता है ।
क्षीणेऽस्रे मधुराकाङ्क्षा मूर्च्छा च त्वचि रूक्षता । शैथिल्यं च शिराणां स्याद्वातादुन्मार्गगामिता ।। १९६ ।।
शरीर में रक्त की कमी होने पर मधुर पदार्थों के खाने की इच्छा, मूर्च्छा, त्वचा में रूक्षता, एवं रक्तक्षीणताजन्य
वात से सिराओं का शिथिल हो जाना तथा अयोग्य मार्ग में चलना ये सब लक्षण उत्पन्न होते हैं ।। १९६ ।।
❖ वाताद्रक्तक्षयजनितात् ।। १९६ ।।
यहाँ 'वाताद्' पद का 'रक्तक्षीणता जन्य वात से' यह अर्थ समझना चाहिये ।। १९६ ।।
अरुणं फेनिलं रूक्षं परुषं तनु शीघ्रगम् । आस्कन्दि सूचीनिस्तोदि रक्तं स्याद्वातदूषितम् ।। १९७ ।।
पित्तेन पीतं हरितं नीलं श्यावं च विस्रकम् । अस्वादूष्णं मक्षिकाणां पिपीलीनामनिष्टकम् ।। १९८ ।।
शीतलं बहुलं स्निग्धं गैरिकोदकसन्निभम् । मांसपेशीप्रभं स्कन्दि मन्दगं कफदूषितम् ।। १९९ ।।
द्विदोषदुष्टं संसृष्टं त्रिदुष्टं पूतिगन्धकम् । सर्वलक्षणसंयुक्तं काञ्जिकाभं च जायते ।। १२० ।।
विषदुष्टं भवेच्छ्यावं नासिकोन्मार्गं तथा । विस्रं काञ्जिकसंकाशं सर्वकुष्ठकरं तथा ।। १२१ ।।
वातादि से दूषित रक्तों के लक्षण-वात से दूषित हुआ रक्त-लाल, झाग युक्त, रूक्ष, कठोर, पतला, शीघ्र
चलने वाला, आस्कन्दी तथा सूई चुभने की सी पीड़ा करने वाला होता है । पित्त से दूषित हुआ रक्त-शीतल, अत्यन्त
स्निग्ध, गेरू के पानी के समान कान्ति वाला, मांस की पेशियों के समान घनीभूत एवं मन्दगामी होता है । दो दोषों से
दूषित रक्त-जिन-जिन दोषों से दूषित होता है उन-उन दोषों के लक्षणों से युक्त होता है । तीन दोषों से दूषित रक्त-
दुर्गन्धयुक्त, हर एक दोषों के लक्षणों से मिला हुआ, काञ्जी के समान होता है । विष से दूषित रक्त-काला, नाक की
राह से निकलने वाला, कच्चे मांस के समान गन्ध वाला, काञ्जी के समान तथा सर्व प्रकार के कुष्ठों को उत्पन्न करने
वाला होता है ।। १९७-१२१ ।।
अथ शुद्धरक्तस्य लक्षणमाह-
इन्द्रगोपप्रभं ज्ञेयं प्रकृतिस्थमसंहतम् ।। १२२ ।।
शुद्ध रक्त के लक्षण-जो शुद्ध रक्त होता है वह इन्द्रगोप (बीरबहूटी) कीड़े के समान देखने में लाल तथा पतला
होता है ।। १२२ ।।
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