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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1096

अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०४५
यह शिरोबस्ति उसी समय दी जाती है तब रोगी भोजन न किया हो। इसका प्रयोग ५ या ७ दिन तक नित्य किया जाता
है। शिरोबस्ति ले चुकने के बाद उक्त टोपी को सावधानी से उतार कर तेल को सिर के चारों तरफ से बंटोर कर अलग
कर देना चाहिये जिसमें इधर-उधर फैलने न पावे। इसके बाद किंचिद् गर्म जल से रोगी के शरीर के ऊपरी भाग को
अच्छी तरह से धुला दे। इस प्रकार यदि शिरोबस्ति का प्रयोग किया जाय तो उससे दुर्जय वातसम्बन्धी शिरः कम्प (सिर
का काँपना) इत्यादि रोग दूर हो जाते हैं। अतएव इसका प्रयोग सभी समयों में करना चाहिये ।।७९-८५।।
पञ्च सप्त दिनानि वेत्युत्त्वा सर्वकालेष्विति शिरःकम्पादिरोगानुवृत्तौ ज्ञेयम् ।।७९-८५।।
यहाँ 'पाँच या सात दिन तक शिरोबस्ति देनी चाहिये' ऐसा कह करके भी जो 'सभी समयों में इसका प्रयोग करना
चाहिये' यह पुनः कहा गया उसका भाव यह समझना चाहिये कि-शिरःकम्प आदि रोग जब तक बने रहें तब तक देना
चाहिये अतः अन्त में ५ या ७ दिन की अवधि का नियम तोड़ दिया गया ।।७९-८५।।
अथ कर्णपूरणविधिमाह-
स्वेदयेत्कर्णदेशन्तु किञ्चिन्नुः पार्श्वशायिनः। मूत्रैः स्नेहै रसैरुष्णैः श्रोत्ररन्ध्रं प्रपूरयेत् ।।८६।।
कर्णञ्च पूरितं रक्षेच्छतं पञ्च शतानि वा। सहस्रं वापि मात्राणां श्रोत्रकण्ठशिरोगदे ।।८७।।
मूत्राद्यैः पूरणं कर्णे भोजनात्प्राक्प्रशस्यते। तैलाद्यैः पूरणं कर्णे भास्करेऽस्तमुपागते ।।८८।।
कर्णपूरण (कान में तेल डालने) की विधि-रोगी को प्रथम एक करवट सुला कर उसके कान के भाग का
किञ्चित् स्वेदन करे तत्पश्चात् गर्म किये हुये मूत्र, स्नेह (घी का तेल) या स्वरस इनमें से योग्यतानुसार किसी से उसके
कान से छिद्र को भर दे। यदि कान-सम्बन्धी रोग से युक्त हो तो सौ मात्रा तक, कण्ठसम्बन्धी रोग वाला हो तो पाँच
सौ मात्रा तक तथा सिरसम्बन्धी रोग से पीड़ित हो तो एक हजार मात्रा तक उक्त मूत्रादि औषधियों को उसके कान में पड़ा
रहने दे, अर्थात् तब तक गिरने से बचाता रहे। यदि रोगी के कान में मूत्र आदि डालना हो तो उसके भोजन करने के
पहले ही डालना उत्तम होता है। स्नेह आदि डालना हो तो सूर्य के अस्त हो जाने पर ही उचित होता है ।।८६-८८।।
तद्यथा-
कर्णे शूलाकुले कोष्णं बस्तमूत्रं ससैन्धवम्। निक्षिपेत्तेन शाम्यन्ति शूलपाकादिजा रुजः ।।८९।।
शृङ्गवेरञ्च मधुकं सैन्धवं तैलमेव च। कदुष्णं कर्णयोर्देयमेतत्स्याद्वेदनाऽपहम् ।।९०।।
पीतार्कपत्रमाज्येन लिप्तं वह्नौ प्रतापयेत्। तद्रसः श्रवणे 'क्षिप्तः कर्णशूलहरः परः ।।९१।।
कान के शूल (दर्द) से व्याकुल रोगों के कान में बकरे का मूत्र सेंधानमक का चूर्ण मिला कर डालना हो तो उसे
भोजन के प्रथम ही डालना चाहिये। इसके प्रयोग करने से कर्णशूल (कान का दर्द), कर्णपाक (कान का पक जाना)
आदि कान के रोग नष्ट हो जाते हैं। यदि अदरख का रस, शहद (या मुलेठी का चूर्ण) और सेंधा नमक के चूर्ण को
किञ्चिद् गर्म करके कानों में डालना हो तो सूर्य के अस्त होने पर डालना चाहिये। इसका प्रयोग कान की पीड़ा को शान्त
करने वाला होता है। आक के पीले पत्तों के ऊपर चारों तरफ घी का लेप करके और आग पर तपा कर यदि उनका
रस कान में डालना हो तो सूर्य के अस्त होने पर डालना चाहिये। इसका प्रयोग कान के शूल (दर्द) को दूर करने में
श्रेष्ठ होता है ।।८९-९१।।
अथ लेपविधिमाह-
आलेपस्य तु नामानि लेपो लेपनलिप्तकौ। दोषघ्नो विषहा वर्ण्यः स च लेपस्त्रिधा मतः ।।
त्रिप्रमाणश्चतुर्भागत्रिभागावर्द्धाङ्गुलोन्नतः। आर्द्रों व्याधिहरः स स्याच्छुष्की दूषयति च्छविम् ।।
लेप की विधि-आलेप, लेप, लेपन तथा लिप्तक, लेप के ये चार नाम हैं। दोषघ्न (दोष को नष्ट करने वाला),
विषहा (विष-नाशक) और वर्ण्य (वर्ण को उत्तम करने वाला) इस प्रकार लेप के तीन भेद हैं। चौथाई अङ्गुल ऊँचा (१/