भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०४१
देना चाहिये। अधिक स्वेद देने से सन्धियों में पीड़ा, दाह, प्यास, क्लान्ति, भ्रम, पित्त तथा रक्त के प्रकोप से उत्पन्न हुये
फोड़े ये सब हो जाते हैं। उस समय शीतल उपचार आर्द्र वस्त्रादि द्वारा करना उचित होता है। अतः भलीभाँति से स्वेद
देना चाहिये ॥५२-५४॥
अथ तापस्वेदविधिमाह-
तेषु तापाभिधः स्वेदो बालुकावस्त्रपाणिभिः । कपालकन्दुकाङ्गारैर्यथायोग्यं हि जायते ॥५५॥
तापस्वेद की विधि-उक्त स्वेदों में ताप नामक स्वेद वह कहलाता है जिसमें योग्यतानुसार बालू, वस्त्र, हाथ,
ठीक्रा, कपड़े की गेंद के आकार की पोटली या अङ्गार द्वारा स्वेद दिया जाता है ॥५५॥
अथोष्मस्वेदविधिमाह-
प्रतप्तैरम्लसिक्तैश्च कायेऽलक्तकवेष्टिते ।।
ऊष्मस्वेदः प्रयोक्तव्यो लोहपिण्डेष्टकादिभिः । अथवा वातनिर्णाशिद्रव्यक्वाथरसादिभिः ॥५६॥
उष्णैर्घटं पूरयित्वा पार्श्वे छिद्रं विधाय च । विमुद्र्यास्यं त्रिखण्डां च धातुजां काष्ठजामुत ॥५७॥
षडङ्गुलास्यां गोपुच्छां नाडीं युञ्ज्याद् द्विहस्तकाम् ।
सुखोपविष्टं स्वभ्यक्तं गुरुप्रावरणावृतम् । हस्तिशुण्डिकया नाड्या स्वेदयेद्वातरोगिणम् ॥५८॥
ऊष्मस्वेद की विधि-रोगी के शरीर को लाख के रस से रँगे हुये वस्त्र से लपेट कर अत्यन्त तपाये हुये लोहे
के पिण्ड अथवा पक्के मिट्टी के ईंटों को कांजी से बुझाते हुये उनसे जो स्वेद दिया जाता है उसे ‘ऊष्मस्वेद’ कहते हैं।
अथवा गर्म वातनाशक द्रव्यों के क्वाथ या रस से एक घड़े को भर कर उसके बगल में एक छिद्र कर दे और घड़े के
मुख को एक शराब (सकोरा) से खूब बन्द कर दे तत्पश्चात् तीन संधि वाली, या धातु या काठ की बनी हुई, भीतर छिद्र
युक्त नली जो कि मूल भाग से ६ अंगुल चौड़ी मुख वाली, गौ के पूंछ के समान क्रम से पतली तथा दो हाथ लम्बी
हो, उसे उक्त छिद्र के अन्दर डाल कर सन्धियों को बन्द कर दे तत्पश्चात् भलीभाँति तेल की मालिश करके सुखपूर्वक
बैठे हुये वातरोगी को भारी रजाई आदि वस्त्र ओढ़ा कर हाथी की सूँड़ के समान क्रम से पतली उक्त नली द्वारा जो स्वेद
दिया जाता है उसे भी ‘ऊष्मस्वेद’ कहते हैं ॥५६-५८॥
❖ त्रिखण्डामिति स्वेदसौकार्यार्थम् । षडङ्गुलास्यामिति मूले षडङ्गुलविशालमुखीं गोपुच्छमिवं क्रमकृशाम् ।
तेनाग्रे गोपुच्छाग्रपरिमाणेण कृशाम् । नाडीम्=अन्तः सरन्ध्राम् । द्विहस्तकां=हस्तद्वयपरिमाणाम् । हस्तिशुण्डिकयेति
हस्तिशुण्डेव क्रमकृशत्वान्नाड्या इयं संज्ञा ॥५६-५८॥
यहाँ स्वेद देने में सुविधा होने के लिये ‘त्रिखण्डाम्-तीन सन्धियों वाली’ यह विशेषण नली का दिया गया है।
‘षडङ्गुलास्याम्’ पद का ‘मूल में ६ अंगुल चौड़े मुखवाली’ तथा ‘गोपुच्छाम्’ पद का ‘गौ के पूंछ के समान क्रम से पतली’
अर्थात्-अग्रभाग में गौ के पूछ के अग्रभाग के समान पतली और ‘नाडीम्’ पद ‘भीतर छिद्र युक्त नली’ एवं ‘द्विहस्तकाम्’
पद का ‘दो हाथ लम्बी’ तथा ‘हस्तिशुण्डिकया’ पद से ‘हाथी की सूंड के समान क्रम से पतली होने से नली का
‘हस्तिशुण्डिका’ यह नाम है ऐसा समझना चाहिये ॥५६-५८॥
पुरुषायाममात्रां वा भूमिं सम्मार्ज्य खादिरैः । काष्ठैर्दग्ध्वा तथाऽभ्युक्ष्य क्षीरधान्याम्लवारिभिः ।।
वातघ्नपत्रैराच्छाद्य शयानं स्वेदयेन्नरम् । एवं भाषादिभिः स्विन्नैः शयानं स्वेदमाचरेत् ॥६०॥
अथवा रोगी की लम्बाई तथा चौड़ाई के बराबर लम्बी तथा चौड़ी भूमि को झाड़ू से बुहार कर उस पर खैर की लकड़ी
रख कर जला दे तत्पश्चात् राख को अलग कर उस तपी भूमि पर दूध वा पूर्वोक्त धान्याम्ल (कांजी) का जल छिड़क
कर उसके ऊपर वातनाशक एरण्ड आदि के पत्रों को बिछा दे और उन्हीं पत्रों पर रोगी को सुला कर तथा मोटे वस्त्र से
ओढ़ा कर जो स्वेद दिया जाता है उसे भी ऊष्मस्वेद कहते हैं । इसी तरह उबाले हुए उड़द आदि के ऊपर रोगी को सुला
कर जो स्वेद दिया जाता है वह भी ऊष्मस्वेद कहलाता है ॥५९-६०॥
६९ .भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA