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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1090

अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०३९
अथ प्रतिसारणविधिमाह-
दन्त जिह्वामुखानां यच्चूर्णकल्कावलेहकैः। शनैर्घर्षणमङ्गुल्या तदुक्तं प्रतिसारणम्।।३७।।
वैरस्यं मुखदौर्गन्ध्यं मुखशोषं तथा तृषाम्। अरुचिं दन्तपीडाञ्च निहन्ति प्रतिसारणम्।।३८।।
हीने जाड्यकफोत्क्लेशावरसज्ञानमेव च। अतियोगान्मुखे पाकः शोषस्तृष्णावमिः क्लमः।।३९।।
प्रतिसारण की विधि-चूर्ण, कल्क अथवा अवलेह द्वारा अंगुली से दाँत, जीभ तथा मुख को जो धीरे-धीरे घिसा
जाता है उसी को प्रतिसारण कहते हैं। प्रतिसारण (मज्जन) करने से मुख की विरसता, दुर्गन्ध तथा शोष (मुख का सूखना)
नष्ट होता है और तृषा, अरुचि तथा दाँतों की पीड़ा दूर होती है। यदि प्रतिसारण हीन मात्रा में किया जाय तो
जड़ता, कफ का प्रकोप तथा मधुरादि रसों का परिज्ञान न होना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। यदि अधिक मात्रा में
प्रतिसारण किया जाय तो मुख का पाक (पक जाना) तथा शोष (सूखना) एवं तृषा, वमन तथा ग्लानि ये सब उत्पन्न
होते हैं ।।३७-३९।।
अथ स्वेदविधिमाह-
स्वेदश्चतुर्विधः प्रोक्तस्तापोष्मस्वेदसंज्ञितः। उपनाहो द्रवः स्वेदः सर्वे वातार्त्तिहारिणः ।।४०।।
स्वेद की विधि-स्वेद (पसीना निकलना) के ४ भेद होते हैं-(१) तापस्वेद, (२) ऊष्मस्वेद, (३) उपनाहस्वेद
और (४) द्रवस्वेद। ये चारो स्वेद वातसम्बन्धी पीड़ा को नष्ट करने वाले होते हैं ।।४०।।
❖ तापस्वेद उष्मस्वेदश्च ताभ्यां संज्ञितः। उपनाहः=उपनाहस्वेद इत्यर्थः ।।४०।।
यहाँ 'तापोष्मस्वेदसंज्ञितः' पद का 'तापस्वेद तथा उष्मस्वेद नाम से प्रसिद्ध' और 'उपनाह' पद का 'उपनाह स्वेद'
यह अर्थ समझना चाहिये ।।४०।।
स्वेदौ तापोष्मजौ प्रायः श्लेष्मघ्नौ समुदीरितौ। उपनाहस्तु वातघ्नः पित्तसङ्गे द्रवो हितः ।।४१।।
उक्त ४ प्रकार के स्वेदों में तापस्वेद तथा ऊष्मस्वेद कफनाशक और उपनाह स्वेद वातनाशक कहा हुआ है। जहाँ
पित्त का विशेष सम्बन्ध होता है वहाँ द्रवस्वेद हितकर कहा हुआ है ।।४१।।
❖ द्रवो हि द्रवस्वेदः ।।४१।।
यहाँ 'द्रव' पद से 'द्रवस्वेद' का ग्रहण किया जाता है ।।४१।।
महाबले महाव्याधौ शीते स्वेदो महान् स्मृतः। दुर्बले दुर्बलः स्वेदो मध्यमे मध्यमो मतः।
बलासे रूक्षणः स्वेदो रूक्षस्निग्धः कफानिले ।।४२।।
यदि रोगी महाबलवान् हो और व्याधि भी बड़ी हो और शीत काल हो तो प्रबल स्वेद कराना चाहिये। यदि रोगी
तथा व्याधि दुर्बल हो तो दुर्बल स्वेद कराना उचित है। मध्यम बलवाला रोगी या व्याधि हो तो मध्यम स्वेद कराना चाहिये।
कफसम्बन्धी रोगों में रूक्षण (रूक्षता करने वाला) स्वेद कराना चाहिये। कफयुक्त वायुसम्बन्धी रोगों में रूक्ष तथा स्निग्ध
स्वेद कराना चाहिये ।।४२।।
❖ रूक्षणः = रूक्षयतीति रूक्षणः। नन्द्यादित्वाल्ल्युट् प्रत्ययः ।।४२।।
यहाँ 'रूक्षण' पद का 'रूक्षता करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये। और 'रूक्ष्' धातु से 'नन्दिग्रहिपचादिभ्यो
ल्युणिन्यचः' इस सूत्र से नन्द्यादि के अन्दर पाठ होने से ल्यु प्रत्यय हुआ और ल की इत्संज्ञा होने के बाद यु को न हुआ
है तथा नकार को णकार होकर सु विभक्ति आई और रुत्व विसर्ग होकर 'रूक्षणः' यह पद सिद्ध होता है ।।४२।।
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