भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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जाङ्गलविष्किराणां वा रसैः शाल्योदनं हितम् ।।८१।।
अथवा जंघालसंज्ञक जीवों का तथा विष्किरसंज्ञक पक्षियों के मांलरस (सुरुवा) के साथ शालि (जड़हन) धान का
चावल खाय क्योंकि यह हितकारी होता है ।।८१।।
❖ हरिणैणकुरङ्गैर्वावातायुमृगमात्रकाः। राजीवः पृषतश्चैव जाङ्गालाः शरभादयः ।।८१।।
यहाँ ‘जङ्गाल’ पद से ‘हरिण, काला हरिण, कुरङ्ग हरिण, रोज हरिण, वातायु, राजीव तथा चित्तल हरिण आदि
मृग जाति के जीव मात्र तथा शरभ आदि पशुओं’ का बोध करना चाहिये ॥
इति विरेकाधिकारः ।
अथानुवासनम् ।
तत्रादावनुवासननिरूहयोर्भेदमाह-
वस्तिर्द्विधाऽनुवासाख्यो निरूहश्च ततः परम्। यः स्नेहो दीयते स स्यादनुवासननामकः ।।
कषायक्षीरतैलैर्यो निरूहः स निगद्यते । बस्तिभिर्दीयते यस्मात्तस्माद्वस्तिरिति स्मृतः ।।८३।।
अनुवासन तथा निरूह के भेद-बस्ति दो प्रकार की होती है (१) अनुवासन और (२) निरूह । अनुवासन-
जहां केवल स्नेह पदार्थ की बस्ति दी जाती है उसे ‘अनुवासन’ कहते हैं। निरूह-जहाँ क्वाथ, दूध तथा तेल मिलाकर
बस्ति दी जाती है उसे ‘निरूह’ कहते हैं । अनुवासन तथा निरूह में तैलादि का प्रयोग ‘बस्ति’ के द्वारा किया जाता है
अतएव ये दोनों बस्ति कहलाते हैं ।।८२-८३।।
❖ वस्तिभिः=मृगादीनां मूत्राशयैः ।।८२-८३।।
यहाँ ‘वस्ति’ पद से ‘मृग आदि के मूत्राशय’ का बोध करना चाहिये, क्योंकि-मूत्राशय का नामान्तर ‘वस्ति’
है ।।८२-८३।।
अथ स्नेहवस्तिविधिमाह-
तत्रानुवासनाख्यो हि वस्तिर्यः सोऽत्र कथ्यते । अनुवासनभेदश्च मात्रावस्तिरुदीरितः ।।८४।।
पलद्वयं तस्य मात्रा तस्मादर्द्धाऽपि वा भवेत् । अनुवास्यस्तु रूक्षः स्यात्तीक्ष्णाग्निः केवलानिलो ।।८५।।
नानुवास्यस्तु कुष्ठी स्यान्मेही स्थूलस्तथोदरी । नास्थाप्यानानुवास्याश्च जीर्णोन्मादतृडर्दिताः ।।
शोथमूर्च्छाऽरुचिभयश्वासकासक्षयातुराः ।।८६।।
स्नेहबस्ति (अनुवासन) की विधि-ऊपर कही हुई बत्तियों में जो अनुवासन नामक बस्ति है उसी के विषय में
कहते हैं । अनुवासन बस्ति का ही भेद ‘मात्राबस्ति’ है। मात्राबस्ति में स्नेह की मात्रा दो पल (८ तोले) या इसकी आधी
एक पल (४ तोले) की होती है। जो मनुष्य रूक्ष शरीर वाला तथा तीक्ष्ण अग्नि वाला हो एवं केवल वातरोगी हो वह
अनुवासनबस्ति देने योग्य होता है । जो कुष्ठ तथा मेह्रोग से पीड़ित हो या स्थूल शरीर वाला अथवा उदर रोग से युक्त
हो वह अनुवासन बस्ति के योग्य नहीं होता । जो जीर्ण शरीर वाला तथा उन्माद, तृषा, शोथ, मूर्च्छा, अरुचि, भय, श्वास
(दमा) या क्षय रोग से पीड़ित हों वे निरूहबस्ति तथा अनुवासन बस्ति दोनों ही के योग्य नहीं होते हैं ।।८४-८६।।
नेत्रं कार्यं सुवर्णादिधातुभिर्वृक्षवेणुभिः । नलैर्दन्तैर्विषाणाग्रैर्मणिभिर्वा विधीयते ।।८७।।
बस्ति देने की नली-सोने आदि धातुओं की या वृक्ष, बाँस, नरसल, हाथी आदि जीवों का दाँत, सींग का अग्रभाग
तथा मणि इन सबों में से किसी एक की बना लेनी चाहिये ।।८७।।
❖ नेत्रं=नाडी । तथा चोक्तं विश्वप्रकाशे-
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