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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1017

यहाँ 'मृदु द्रव्य' से 'गीले द्रव्य गिलोय आदि' 'कठिन द्रव्य' से 'सूखे द्रव्य सोंठ आदि' तथा 'अत्यन्त कठिन द्रव्य'
से 'बहुत दिन के सूखे हुये देवदारु आदि' का बोध करना चाहिये ॥५०-५१॥
कर्षादितः पलं यावत्क्षिपेत्षोडशिकं जलम् । तदूर्ध्वं कुडवं यावद् भवेदष्टगुणं पयः ॥
प्रस्थादितः क्षिपेन्नींरं खारीं यावच्चतुर्गुणम् ॥५२॥
एक कर्ष (१ तोले) से लेकर पल (४ तोले) पर्यन्त द्रव्य में १६ गुना जल डालना चाहिये । उसके उपरान्त कुडव
(४ पल) पर्यन्त में ८ गुना जल डालना चाहिये । प्रस्थ (१६ पल) से लेकर खारी (४०९६ पल) पर्यन्त में चौगुना जल
डालना चाहिये ॥५२॥
❖ पूर्वं 'चतुर्गुणं मृदुद्रव्य' इत्यादिना क्वाथ्यद्रव्यगतमृदुत्वादिगुणभेदेन जलगतपरिमाणमुक्तम् । इदानीं
केचिदाचार्याः 'कर्षादितः पलं यावदि' त्यादिवचनेन क्वाथ्यद्रव्यगतपरिमाणभेदेन जल