भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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स्वरसस्य गुरुत्वाच्च पलमर्द्धं प्रयोजयेत्। निशोषितं चाग्निसिद्धं पलमात्रं रसं पिबेत् ॥५॥
पाँच प्रकार के कषायों में स्वरस नामक कषाय गुरु होता है अतः इसकी मात्रा आधे पल (दो तोले) की देनी चाहिये।
जो रातभर का रखा तथा अग्नि से सिद्ध किया हुआ अर्थात् औटाया हुआ रस हो उसकी मात्रा पीने में एक पल की देनी
चाहिये ॥५॥
❖ निशोषितं=निशायामुषितम् ॥५॥
‘निशोषितम्’ पद का ‘रातभर का रखा हुआ’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥५॥
सितामधुगुडक्षारञ्जीरकं लवणं तथा। घृतं तैलञ्च चूर्णादीन् कोलमात्रान् रसे क्षिपेत् ॥६॥
साफ किया हुआ शक्कर, मधु, गुड़, खार, जीरा, नमक, घी, तेल अथवा चूर्ण आदि यदि स्वरस में डालना हो
तो एक कोल (६ माशे) डाले ॥६॥
❖ कोलः=टङ्कद्वयम् ॥६॥
‘कोल’ पद से दो टङ्क (६ माशे) का बोध करना चाहिये ॥६॥
अथ तण्डुलजलविधिमाह-
कण्डितं तण्डुलपलं जलेऽष्टगुणिते क्षिपेत्। भावयित्वा जलं ग्राह्यं देयं सर्वत्र कर्मसु ॥७॥
चावल के धोवन की विधि—कूटे हुये साफ चावलों को एक पल (४ तोले) लेकर अठगुने (३२ तोले) जल
में डाल कर, उन्हें कोमल अर्थात् एक घण्टे तक भिगो कर नरम कर ले। पश्चात् जहाँ-जहाँ आवश्यकता हो वहाँ-वहाँ
सभी कार्यों में चावलों को अलग कर केवल जल ग्रहण करें ॥७॥
भावयित्वा=कोमलीकृत्य ॥७॥
‘भावयित्वा’ पद का ‘कोमल कर के’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥७॥
अथ हिमनिर्माणविधिमाह-
क्षुण्णं द्रव्यपलं सम्यक् षड्भिर्नीरपलैः प्लुतम्।
निशोषितं हिमः स स्यात्तथा शीतकषायकः। तस्य मानं मतं पाने पलद्वयमितं बुधैः ॥८॥
हिम बनाने की विधि—अच्छी तरह से चूर्ण किये हुये एक पल (४ तोले) द्रव्य (ओषधि) को ६ पल (२४ तोले)
जल में भिगो कर रात भर पड़ा रहने देने पर प्रातःकाल उस जल को हिम तथा शीतकषाय कहते हैं। इसकी मात्रा पीने
में पण्डितों ने २ पल (८ तोले) की मानी है ॥८॥
❖ क्षुण्णं=चूर्णीकृतम् ॥८॥
‘क्षुण्णम्’ पद का ‘चूर्ण किये हुये’ अर्थ समझना चाहिये ॥८॥
अथ मन्थनिर्माणविधिमाह-
जले चतुष्पले शीते क्षुण्णं क्षुण्णं द्रव्यपलं क्षिपेत्। मृत्पात्रे मन्थयेत् सम्यक् तस्माच्च द्विपलं पिबेत् ॥९॥
मन्थ बनाने की विधि—४ पल (१६ तोले) शीतल जल में चूर्ण किये हुये एक पल (४ तोले) द्रव्य को डाल
दे और उसे मिट्टी के पात्र (हंड़िया) में रख कर अच्छी तरह से मथे, उस मथे हुये जल को ‘मन्थ’ कहते हैं। इसकी मात्रा
पीने में दो पल (८ तोले) की है ॥९॥
❖ क्षुण्णं=चूर्णीकृतम्। मन्थयेत्=मथ्नीयात् ॥९॥
‘क्षुण्णम्’ पद का ‘चूर्ण किये हुये’ और ‘मन्थयेत्’ पद का ‘मथे’ यह अर्थ समझना चाहिये ॥९॥