भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
ब्रह्मसूत्र-शाङ्करभाष्यम्
श्रीवाचस्पति मिश्र प्रणीत 'भामती' संवलित
स्वामी योगीन्द्रानन्द कृत
'भामती' हिन्दी व्याख्या विभूषित
चौखम्बा विद्याभवन
वाराणसी
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शान्तनु सिंह 'बिसेन'
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विद्याभवन प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला
१२
महर्षिबादरायणप्रणीतम्
ब्रह्मसूत्रम्
परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्गोविन्दभगव-
त्पूज्यपादशिष्य श्रीमच्छङ्कराचार्यभगव-
त्पूज्यपादविरचितम्
शारीरकमीमांसाभाष्यम्
श्रीमद्वाचस्पतिमिश्रभावितभाष्यविभागो
भामती
परमहंसपरिव्राजकाचार्योदासीनवर्यस्वामिश्री-
ऋषिरामशिष्यस्वामियोगीन्द्रानन्द-
निर्मिता
भामतीव्याख्या
१
प्रथमो भागः
चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-२२१००१
प्रकाशक
चौखम्बा विद्याभवन
( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक )
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सर्वाधिकार सुरक्षित
संस्करण २००५ ई
मूल्य ३००-००
अन्य प्राप्तिस्थान
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३८ यू. ए., बंगलो रोड, जवाहरनगर
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मुद्रक
फूल प्रिन्टर्स
वाराणसी
दो शब्द
प्रस्तुत ग्रन्थ की अन्तःपरिधि का अध्ययन करने से पहले इसके बाह्य कलेवर की मीमांसा आवश्यक प्रतीत होती है, क्योंकि नाम और रूप का परिवेश ही अपने में अवगुण्ठित अस्ति-भाति-प्रियतत्त्व का उपलक्षक माना जाता है, परीक्षित लक्षण लक्ष्य का सटीक परिचायक होता है। फलतः ग्रन्थ का नाम तथा उसके रचयिता का कुछ परिचय कराया जाता है—
१. ग्रन्थ और ग्रन्थकार
१. ग्रन्थ का नाम—'ब्रह्मसूत्र' इस ग्रन्थ की प्रख्यात समाख्या है। सूत्र-ग्रन्थों का नामकरण दो प्रकार से होता आया है—(१) प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से, जैसे 'सांख्यसूत्र,' 'न्यायसूत्र' इत्यादि। (२) ग्रन्थकार के नाम पर भी ग्रन्थ का नाम रखा जाता है, जैसे 'पाणिनिसूत्र', 'कात्यायनसूत्र', 'जैमिनिसूत्र'। ब्रह्मविषयिणी मीमांसा को 'ब्रह्मसूत्र' कहना सर्वथा न्याय-संगत है।
आदरणीय वासुदेवशरण अग्रवाल ने कुछ पाश्चात्य विचारकों के साक्ष्य पर इस ग्रन्थ का नाम 'भिक्षुसूत्र' बताया है¹। दार्शनिक वाङ्मय के प्रमुख पारखी श्री गोपीनाथ कविराज ने अपनी प्रसिद्ध ब्रह्म-सूत्र-भूमिका (पृ० २) में लिखा है कि यदि यह कल्पना सत्य है, तब वह 'भिक्षुसूत्र' 'वेदान्तसूत्र' या 'ब्रह्मसूत्र' से भिन्न नहीं होगा"। कविराज जी की इस व्यवस्था से असहमति व्यक्त करते हुए उदयवीर शास्त्री कहते हैं² कि "पाणिनि ने पञ्चशिख की सांख्यविषयक रचना का 'भिक्षुसूत्र' पद से निर्देश किया है। फलतः पाणिनि के इस सूत्र के आधार पर कविराज डा० गोपीनाथ द्वारा की गई कल्पना पूर्णरूप से सन्दिग्ध है"।
गवेषकों का बहुमत इसी पक्ष में प्रतीत होता है कि पाणिनि-सूत्र में निर्दिष्ट 'भिक्षुसूत्र' यह 'ब्रह्मसूत्र' नहीं, क्योंकि यह यदि कृष्णद्वैपायन व्यास-द्वारा रचित मान भी लिया जाय, तब भी व्यास को पाराशर्य मुख्यतः नहीं कहा जा सकता, क्योंकि 'पराशर' शब्द से गोत्रार्थ में "गर्गादिभ्यो यञ्" (पा० सू० ४।१।१०५) इस सूत्र के द्वारा यञ् प्रत्यय करने पर पाराशर्य' शब्द सम्पन्न होता है। "अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्" (पा. सू. ४।१।१६२) इस सूत्र के द्वारा पौत्र-प्रपौत्रादि की ही गोत्र संज्ञा होती है, साक्षात् पुत्र की नहीं, व्यास तो पराशर के साक्षात् पुत्र थे, अतः व्यास को पाराशर्य कहना क्योंकर सम्भव होगा ? दूसरी बात यह भी है कि वहाँ कर्मन्द के द्वारा प्रणीत अन्य भी भिक्षुसूत्र निर्दिष्ट है, अतः भिक्षुसूत्र अनेक मानने ही पड़ते हैं तब इस बादरायण-सूत्र को उस झमेले में डालने की आवश्यकता नहीं। आगे चल कर यह कहा जायगा कि तर्कपाद में आलोचित विषय और उनकी सूत्र-निर्दिष्ट परिभाषाएँ बुद्ध-काल से बहुत परवर्ती बौद्धाचार्यों-द्वारा उद्भावित हैं, अतः बुद्धकालीन पाणिनि-सूत्रों में आबद्ध भिक्षुसूत्र कोई अन्य ही होगा, जो इस समय उपलब्ध नहीं। हाँ, नागार्जुन (ई. द्वितीय शताब्दी) के द्वारा प्रतिपादित शून्यवाद का निराकरण सूत्रों में न होने के कारण उससे पूर्व किसी समय की यह रचना मानी जाती है।
२. ग्रन्थकार—इस सूत्र-ग्रन्थ का रचयिता कौन है? इस प्रश्न के उत्तर में
¹ "पाणिनिकालीन भारत" के पृष्ठ ३२६ पर लिखा है—'वेबर का मत है कि पा. सू. ४।३।११०,१११ में पाणिनि बुद्धकालीन ब्राह्मण-भिक्षुओं का उल्लेख कर रहे हैं। पाराशर्य-कृत भिक्षुसूत्र वर्तमान वेदान्तसूत्र ज्ञात होते हैं।'
² 'वेदान्त दर्शन का इतिहास' पृ० ६० पर।
४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्
पञ्चपादिकाकारादि के द्वारा बादरायण का नाम प्रस्तुत किया जाता है¹। खण्डनखण्डखाद्य-
कार भी उसी का समर्थन करते हुए प्रतीत होते हैं²। श्री वाचस्पति मिश्रादि आचार्यगण
वेदव्यास की चर्चा करते हैं³। इन विभिन्न वादों का सामञ्जस्य करनेवाले विद्वानों का कहना
है कि दोनों नाम उन्हीं महर्षि कृष्णद्वैपायन के हैं, जिन्होंने महाभारत आदि इतिहासों और
अष्टादश पुराणों की रचना की। इतना ही नहीं पातञ्जल योगसूत्रों के भाष्यकार भी वे ही
हैं⁴। चिरजीवी महायोगियों का जीवन कई सहस्र वर्ष तक बना रहता है, समय-समय पर
श्रद्धालु अधिकारियों को दर्शन देते रहते हैं। भगवान् आद्य शङ्कराचार्य को भी काशी में
महर्षि वेदव्यास ने दर्शन देकर भाष्य-प्रणयन की प्रेरणा दी थी।
यहाँ यह विचारणीय है कि 'वेदव्यास' या 'व्यास' नाम का एक ही महापुरुष हुआ
है ? अथवा अनेक ? यदि एक ही है, तब वह निश्चित कृष्णद्वैपायन व्यास है, बादरायण-व्यास
कैसे ? यदि व्यास अनेक हैं, तब उनमें बादरायण व्यास का उल्लेख है ? या नहीं ? इस विषय
की चर्चा करते हुए स्वयं महर्षि पराशर ने कहा है कि व्यास एक नहीं, अट्ठाईस हुए हैं—
वेदव्यासा व्यतीता ये ह्यष्टाविंशति सत्तम।
चतुर्धा यैः कृतो वेदो द्वापरेषु पुनः पुनः॥ (वि. पु. ३।३।१०)
अट्ठाईसों के क्रमशः नाम इस प्रकार हैं—
| १. स्वयम्भू (ब्रह्मा) | १५. त्रय्यारुण |
| २. प्रजापति | १६. धनञ्जय |
| ३. शुक्राचार्य | १७. क्रतुञ्जय |
| ४. बृहस्पति | १८. जय |
| ५. सविता | १९. भरद्वाज |
| ६. मृत्यु (यम) | २०. गौतम |
| ७. इन्द्र | २१. हर्यात्मा |
| ८. वसिष्ठ | २२. वाजश्रवा मुनि |
| ९. सारस्वत | २३. तृणविन्दु |
| १०. त्रिधामा | २४. ऋक्ष |
| ११. त्रिशिख | २५. शक्ति |
| १२. भरद्वाज | २६. पराशर |
| १३. अन्तरिक्ष | २७. जातुकर्ण |
| १४. वर्णी | २८. कृष्णद्वैपायन |
कथित अट्ठाईस व्यासों में जैसे कृष्णद्वैपायन का स्पष्ट उल्लेख है, वैसा बादरायण का नहीं,
अतः बादरायण को कृष्णद्वैपायन व्यास से भिन्न मानना अनिवार्य है।
"अपि च स्मर्यते" (ब्र. सू. २।३।४५) इस सूत्र में निर्दिष्ट स्मृति के रूप में भाष्यकार
१. पञ्चपादिका के मङ्गल-पद्यों में कहा है —
नमः श्रुतिशिरःपद्मषण्डमार्तण्डमूर्तये ।
बादरायणसंज्ञाय मुनये शमवेश्मने ॥
२. खण्डन. पृ. ८ पर कहा है—"भगवत्पादेन वा बादरायणीयेषु सूत्रेषु भाष्यं नाभाषि"।
३. भामती-मङ्गल-श्लोकों में कहा है—"वेदव्यासाय धीमते"।
४. द्र. सर्वशास्त्रनिष्णात स्वामी बालराम द्वारा व्याख्यात योग-भाष्य की भूमिका।
हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ५
ने "ममैवांशो जीवलोके" (गी. १५।७) इस गीता-पद्य को प्रस्तुत किया है। यदि गीताशास्त्र के प्रणेता भगवान् व्यास ही ब्रह्मसूत्रकार हैं, तब वे अपनी ही कृति को स्मृति के रूप में उल्लिखित करते हैं—यह समुचित प्रतीत नहीं होता, अत एव भगवद्गीता १ में जो 'ब्रह्मसूत्र' पद आया है, उसका अर्थ आचार्य शङ्कर ने किया है—"ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्म-सूत्राणि। आत्मेत्येवोपासीत (बृह. उ. १।४।७) इत्यादिभिर्हि ब्रह्मसूत्रपदैः आत्मा ज्ञायते" (गी. १३।४)। इससे यह नितान्त स्पष्ट हो जाता है कि गीता में निर्दिष्ट 'ब्रह्मसूत्र' पद से बादरायणीय सूत्रों का ग्रहण सम्भव नहीं, क्योंकि उनकी रचना गीता के बहुत पश्चात् की गई है। स्वयं भगवान् शङ्कराचार्य "अनावृत्तिः शब्दात्" (ब्र. सू. ४।४।२२) इस सूत्र की पातनिका में कहते हैं—"भगवान् बादरायणः आचार्यः पठति"।
श्री बालगङ्गाधर तिलक ने जो अपने 'गीता-रहस्य' में व्यवस्था दी है कि 'पहले कोई विस्तृत गीता बनी, उसके अनन्तर ब्रह्मसूत्र और उसके पश्चात् संक्षिप्त गीता की रचना की गई, अत एव ब्रह्मसूत्र में गीता और गीता में ब्रह्मसूत्र का उल्लेख संगत है'। तिलक जी का वह बौद्धिक व्यायाम ऋषियों की असीम शक्ति को सीमित कर देता है। जैसे हमलोग कुछ लिख कर उसे काटते-कूटते और बढ़ाते-घटाते हैं, वैसे ऋषिगण नहीं किया करते। उनकी सधी लेखनी से जो लकीर बन गई, वह पत्थर की लकीर हो जाती थी।
बादरायण-सूत्रों में जो सांख्य, योग और पाञ्चरात्र आदि के मतवाद आलोचित हैं, उनका मूलरूप महाभारत २ में पाया जाता है, अतः महाभारत-काल के पश्चात् ही इनकी रचना सिद्ध होती है।
३. आचार्य बादरायण का समय
ऊपर के विवेचनों से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि बौद्धों की महायानिक धारा का उद्गम हो जाने के अनन्तर ही आचार्य बादरायण के अद्वयवाद का समुदय होता है—जैमिनि और बादरायण का एक-दूसरे के सूत्रों में परस्पर उल्लेख होने के कारण दोनों समसामयिक हैं। जैमिनि का समय ई. पूर्व द्वितीय शताब्दी माना जाता है, अतः ३श्रीदास गुप्ता के अनुसार ईसा-पूर्व द्वितीय शताब्दी ही बादरायण का समय मानना उचित प्रतीत होता है। श्री उदयवीर शास्त्री का जो महान् प्रयत्न समूचे हिमालय पर्वत को पीछे ढकेलने में हो रहा है, वह तभी सफल हो सकता है, जब कि महाभारत-काल को स्थिर और ध्रुव माना जा सके, किन्तु यह एक टेढी खीर है। आचार्य बादरायण चाहे पुरातन हों या नूतन, उनका व्यक्तित्व सदैव श्रद्धास्पद और सराहनीय ही रहेगा।
जैमिनि-सूत्रों में केवल बादरायण का ही उल्लेख नहीं, अपितु बादरायण-सूत्र चर्चित आचार्यों का बहुत साम्य है, अतः दोनों के सूत्रों में निर्दिष्ट व्यक्तियों की नामावलि प्रस्तुत की जाती है—
४. जैमिनि सूत्र-निर्दिष्ट आचार्य—बादरायण (१।१।५), बादरि (३।१।३, ६।१।२७, ८।३।६, ९।२।२०), आश्मरथ्य (६।५।१६, १६।२।१), आत्रेय (४।३।१८, ५।२।१८, ६।१।२६),
१. "ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः" (गी० १३।४)
२. सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा।
ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै॥ (म. भा. शान्ति ३४९।६४)
३. इण्डियन फिलासफी का हिन्दी रूपान्तर भाग १ पृ. ४२६
४. शाण्डिल्य सूत्रों में बादरायण के लिए कहा है—
"आत्मैकपरां बादरायणः" (शां. सू. ३०)
| ६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् |
|---|
कार्ष्णाजिनि (४।३।१५, ६।७।२६), ऐतिशायन (३।२।४३, ३।४।२४, ६।१।६), कामुकायन (११।१।५६, ११।१।६१), कार्षापण (४।३।१७, ६।७।३५), लाबुलायन (६।७.३७), आलेखन (६।५।१७, १६।२।१) ।
५. बादरायण-सूत्र-उद्धृत आचार्य-जैमिनि (१।२।२८, १।२।३१, १।३।३१, १।४।१८, ३।२।४०, ३।४।२-७, ३।४।१८, ३.४.४०, ४।३।१२, ४।४.५, ४।४।११), बादरि (१।२।३०, ३।१।११, ४।३।७, ४।४।१०), आश्मरथ्य (१।२।२६, १।४।२०), आत्रेय (३।४।४४), काशकृत्स्न (१।४।२२), कार्ष्णाजिनि (३।१।२९), औडुलोमि (१।४।२१, १।४ ४५, ४।४।६) ।
२. भाष्यकार भगवान् शङ्कर
आज-कल ७८८ ई० से लेकर ८२० ई० तक का समय आचार्य शङ्कर का माना जाता है, क्योंकि आचार्य शङ्कर के समकालिक एवं प्रधान शिष्य श्री सुरेश्वराचार्य ने बौद्धाचार्य श्री धर्मकीर्ति का उल्लेख किया है। धर्मकीर्ति का समय ६०० ई० से लेकर ६५० ई० तक माना जाता है। अन्य विद्वानों का यह मत है कि आचार्य शङ्कर धर्मकीर्ति और दिङ्नाग के मध्य में हुए हैं, क्योंकि आचार्य ने अपने भाष्य में दिङ्नाग के प्रमाणसमुच्चय से एक वाक्य उद्धृत किया है²- 'सहोपलम्भनियमादभेदः' । किंतु प्रत्यक्ष के लक्षण में धर्मकीर्ति ने जो 'अभ्रांत' पद जोड़ा है, वह शां. भाष्य में उद्धृत नहीं । यद्यपि मठाम्नायों की परम्परा से उक्त समय का मेल नहीं खाता, तथापि श्री गोपीनाथ कविराज-जैसे इतिहासवेत्ता आस्तिक पुरुषों ने कहा है— "गोडपादाचार्य तक गुरु-परम्परा को ऐतिहासिक काल के अन्तर्गत मानने में कोई मत-भेद नहीं है, परन्तु गौडपाद के गुरु शुकदेव तथा उनके गुरु व्यास—इसी क्रम से प्राचीन गुरु-परम्परा वर्तमान ऐतिहासिक विचार के बहिर्भूत है" (ब्र. सू. भूमिका पृ. १९) ।
३. भामतीकार श्रीवाचस्पतिमिश्र
सर्वतन्त्रस्वतन्त्र श्री वाचस्पतिमिश्र ने तो न्यायसूचीनिबन्ध में अपने समय का उल्लेख कर ही दिया है⁴। उसके अनुसार ८९८ वि. संवत् या ८४१ ई. निश्चित होता है। भामती व्याख्या सम्भवतः इनकी अन्तिम रचना है, जैसा कि अपनी रचनाओं का क्रम-निर्देश स्वयं मिश्रजी ने भामती के अन्त में किया है—
यन्न्यायकर्णिकातत्त्वसमीक्षातत्त्वबिन्दुभिः ।
यन्न्यायसांख्ययोगानां वेदान्तानां निबन्धनैः ॥
सबसे पहले श्री मण्डनमिश्र के विधिविवेक की व्याख्या न्याय-कर्णिका की रचना की गई, उसके पश्चात् ब्रह्म-सिद्धि की व्याख्या तत्त्वसमीक्षा, तत्त्वबिन्दु (स्वतन्त्र भाट्टपक्षीय शाब्द-ग्रन्थ)। न्याय में उद्योतकर-वार्तिक की व्याख्या तात्पर्यटीका, सांख्य में ईश्वरकृष्ण-कृत कारिकाओं की व्याख्या सांख्यतत्त्वकौमुदी, योग में पातञ्जल सूत्रों के व्यास-भाष्य की व्याख्या तत्त्ववैशारदी—इन ग्रन्थरत्नों का निर्माण हुआ। सबसे अन्त में ब्रह्मसूत्र-शाङ्करभाष्य की व्याख्या भामती की रचना की गई।
१. "त्रिष्वेव त्वविनाभावादिति यद् धर्मकीर्तिना ।
प्रत्यज्ञायि प्रतिज्ञेयं हीयेतासौ न संशयः ॥" (बृह० वा० ४।३।७५३)
२. ब्र० सू० भा० २।२।२८ में उद्धृत वाक्य से भिन्न यह पद्य है—
सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः ।
भेदश्च भ्रान्तिविज्ञानेर्दृश्येतेन्दाविवाद्वये ॥ (प्र० वा० २।३९)
४. न्यायसूचीनिबन्धोऽयमकारि सुधिया मुदे ।
श्रीवाचस्पतिमिश्रेण वस्वङ्कवसुवत्सरे ॥