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सर्वकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 606
५८८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. १६

यथा सिकताभ्यस्तैलम् । तस्मात्प्रागुत्पत्तेरनन्यत्वादुत्पन्नमप्यनन्यदेव कारणात्कार्यमित्यवगम्यते । यथा च कारणं ब्रह्म त्रिषु कालेषु सत्त्वं न व्यभिचरति, एवं कार्यमपि जगत्त्रिषु कालेषु सत्त्वं न व्यभिचरति । एकं च पुनः सत्त्वमतोऽप्यनन्यत्वं कारणात्कार्यस्य ॥ १६ ॥

भामती

पलभ्यते, नैवं प्रत्युत्पन्नं तैलं सिकतात्मना । तेन यथा सिकतायाः तैलं न जायत एवमात्मनोऽपि जगन्न जायेत, जायते च, तस्मादात्मात्मनाऽऽसीदिति गम्यते । उपपद्यन्तरमाह ॐ यथा च कारणं ब्रह्म इति ॐ । यथा हि घटः सर्वदा सर्वत्र घट एव न जात्वसौ क्वचित् पटो भवत्येवं सदपि सर्वत्र सर्वदा सदेव न तु क्वचित् कदाचिदसद्भवितुमर्हतीत्युपपादितमधस्तात् । तस्मात् कार्यं त्रिष्वपि कालेषु सदेव । सत्त्वं चेत् किमतस्तयोरेवमित्यत आह ॐ एकञ्च पुनः इति ॐ । सत्त्वं चैकं कार्यकारणयोः, नहि प्रतिव्यक्ति सत्त्वं भिद्यते, ततश्चाभिन्नसत्तान्वयवादेते अपि मिथो न भिद्येते इति । न च ताभ्यामनन्यत्वात् सत्त्वस्यैव भेद इति युक्तम् । तथा सति हि सत्त्वस्य समारोपितत्वप्रसङ्गः । तत्र भेदाभेदयोरन्यतरसमारोपकल्पनायां किं तात्त्विकाभेदोपादाना भेदकल्पनास्त्वाहो तात्त्विकभेदोपादानाभेदकल्पनेति । वयं तु पश्यामो भेदग्रहस्य प्रतियोगिग्रहापेक्षत्वाद्द्वेदग्रहमन्तरेण च प्रतियोगिग्रहासम्भवादन्धोऽन्याश्रयापत्तेः, अभेदग्रहस्य च निरपेक्षतया तदनुपपत्तेः, एकैकाश्रयत्वाच्च भेदस्यैकाभावे तदनुपपत्तेः, अभेदग्रहोपादानैव भेदकल्पनेति सर्वमवदातम् ॥ १६ ॥

भामती-व्याख्या

न वर्तते, न तत् तत उत्पद्यते”। तेल बालू में तादात्म्येन नहीं रहता, अतः बालू से तेल उत्पन्न नहीं होता । घट मृत्तिका में मृत्तिकात्वेन रहता है, अतः वह मृत्तिका से उत्पन्न होता देखा जाता है । यही कारण है कि वर्तमान घट मृत्तिकात्वेन उपलब्ध होता है, किन्तु वर्तमान तेल सिकतात्वेन उपलब्ध नहीं होता । फलतः जैसे सिकता (बालू) से तैल उत्पन्न नहीं होता, वैसे ही आत्मा से भी आकाशादि प्रपञ्च उत्पन्न नहीं हो सकता था, किन्तु उत्पन्न होता है, अतः प्रपञ्च आत्मरूपेण आत्मा में अवस्थित था—ऐसी अवगति (अनुमिति) होती है । इसी अर्थ की पुष्टि के लिए अन्य युक्ति दिखाते हैं—“यथा च कारणं ब्रह्म त्रिषु कालेषु सत्त्वं न व्यभिचरति एवं कार्यमपि”। जैसे कि घट सर्वदा सर्वत्र घट ही है, वह कभी पट नहीं होता, वैसे ही सत् पदार्थ सदैव सत् ही रहेगा, कभी असत् नहीं हो सकता—ऐसा पहले कहा जा चुका है । इससे यह सिद्ध हो गया कि कार्य प्रपञ्च तीनों कालों में सत् ही है । कार्य का सत्त्व मान लेने से क्या लाभ ? इस प्रश्न का उत्तर है—“एकं च पुनः सत्त्वमतोऽप्यनन्यत्वं कारणात्कार्यस्य”। कार्य और कारण में सत्त्व एक ही है, प्रत्येक व्यक्ति में सत्त्व भिन्न-भिन्न नहीं रहता, इस लिए अभिन्न (एक) सत्ता से अभिन्न होने के कारण कार्य और कारण परस्पर भिन्न नहीं हो सकते । ‘कार्य और कारण भिन्न हैं, अतः भिन्न पदार्थों से अभिन्न होने के कारण सत्त्व का ही भेद क्यों न मान लिया जाय ?’ इस शङ्का का समाधान यह है कि वैसा मानने पर सत्त्व में समारोपितत्व प्रसक्त होगा, क्योंकि तब यह विकल्प उठ खड़ा होता है कि भेद और अभेद—इन दोनों में से एक के समारोप की कल्पना में क्या तात्त्विक अभेद में भेद की कल्पना (आरोप) की जाय ? अथवा तात्त्विक भेद में अभेद की कल्पना की जाय ? हम अद्वैतवेदान्तियों का दृष्टिकोण यह है कि भेद-ज्ञान अपने प्रतियोगियों के ज्ञान पर निर्भर है, क्योंकि प्रतियोगियों के ज्ञान के बिना भेद-ज्ञान सम्भव नहीं, इस प्रकार अन्योऽन्याश्रय दोष हो जाता है, अतः अभेद में ही भेद की कल्पना माननी उचित है। अभेद-ज्ञान निरपेक्ष है, अतः अन्योन्याश्रयता नहीं । एक-एक व्यक्ति के आश्रित भेद रहता है, अतः भेद को एकत्व या अभेद की नियमतः अपेक्षा है, अतः अभेद-ग्रह में ही भेद की कल्पना न्याय-