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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 639 में से

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पृष्ठ 504

४८६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. ११

भेदाकाङ्क्षायां न पंच पंचजना इति विशेषणं भवेत्। भवदपीदं विशेषणं पंचसंख्याया एव भवेत्, तत्र चोक्तो दोषः। तस्मात्पंच पंचजना इति न पंचविंशतितत्त्वाभिप्रायम्।

अतिरेकाच्च न पंचविंशतितत्त्वाभिप्रायम्। अतिरेको हि भवत्यात्माकाशाभ्यां


भामती

संख्या सम्बध्यते। स्यादेतत्—संख्येयानां जनानां मा भूच्छब्दान्तरवाच्यसंख्यावच्छेदः पञ्चसंख्यायास्तु तयावच्छेदो भविष्यति, न हि साव्यवच्छिन्नेत्यत आह ॐ भवदपीदं विशेषणम् इति ॐ। उक्तोऽत्र दोषः। नह्युपसर्जनं विशेषणेन युज्यते, पञ्च शब्द एव तावत्संख्येयोपसर्जनसंख्यामाह विशेषतस्तु पञ्चजना इत्यत्र समासे। विशेषणापेक्षायां तु न समासः स्यादसामर्थ्यान्नहि भवति ऋद्धस्य राजपुरुष इति समासोऽपि वृत्तिरेव ऋद्धस्य राज्ञः पुरुष इति सापेक्षत्वेनासामर्थ्यादित्यर्थः। ॐ अतिरेकाच्च इति ॐ। अभ्युच्चय-


भामती-व्याख्या

द्वितीय 'पंच' शब्द का प्रयोग क्योंकर होगा ? यद्यपि द्रव्यार्थक पद का विशेषण असमस्त भी होता है और उसके द्वारा अभिहित संख्या भी उस द्रव्य की परिच्छेदिका मानी जाती है। तथापि जनपदार्थ की उत्पत्ति (ज्ञप्ति) के जनकीभूत 'पंचजन'—इस शब्द के पूर्वपद से उपदिष्ट (प्रतिपादित) होने से पंचत्व संख्या समीपतर है, अतः इसी के द्वारा जन पदार्थ का परिच्छेद होगा, पदान्तराभिहित संख्या के द्वारा नहीं [उत्पत्ति-शिष्ट पदार्थ सदैव उत्पन्न-शिष्ट की अपेक्षा प्रबल माना जाता है, जैसे कि चातुर्मास्य नाम की इष्टि के प्रथम पर्व में "तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेवी आमिक्षा"—इस वाक्य के द्वारा आमिक्षाद्रव्यक याग का विधान किया गया। खौलते दूध में दही डाल देने से दूध फट कर दो भागों में विभक्त हो जाता है—(१) पनीर या छेना और (२) पानी। पनीर को 'आमिक्षा' और पानी को 'वाजिन' कहते हैं। आमिक्षा-याग-विधान के अनन्तर "वाजिभ्यो वाजिनम्"—यह वाक्य पठित है, इसमें यह सन्देह है कि इस वाक्य के द्वारा पूर्वोक्त आमिक्षा-याग में वाजिनरूप द्रव्यान्तर का विधान किया गया है ? अथवा इस वाक्य के द्वारा वाजिनद्रव्यक कर्मान्तर का ? सिद्धान्त में वार्तिककार ने कहा है—

आमिक्षोत्पद्यमानेन कर्मणा सह युज्यते।
ततो वाक्यान्तरोपात्तमुत्पन्नेन तु वाजिनम्॥ (तं० वा० पृ० ५३७)

जिस वाक्य में आमिक्षा-याग को उत्पत्ति (विधि) होती है, उसी वाक्य में पूर्वपद के द्वारा आमिक्षा का अभिधान होने से आमिक्षा उत्पत्ति-शिष्ट है और उस वाक्य से उत्पन्न (विहित) कर्म के उद्देश्य से वाक्यान्तर के द्वारा वाजिन द्रव्य का विधान किया जाता है, अतः वाजिन उत्पन्न-शिष्ट है। उत्पत्ति-शिष्ट प्रबल होने से पहले ही कर्म के साथ अन्वित हो जाता है। एक द्रव्य से युक्त कर्म में वाजिनरूप द्रव्यान्तर को अवकाश नहीं मिल पाता, अतः "वाजिभ्यो वाजिनम्"—यह वाक्य कर्मान्तर का विधायक है]।

शङ्का—'पञ्चजन' यहाँ 'पञ्चत्व' संख्या का परिच्छेद्य (संख्येय) जो जनपदार्थ है, वह अन्य (समासाघटक) पद के द्वारा प्रतिपादित संख्या का परिच्छेद्य यदि नहीं हो सकता, तब उसकी परिच्छेदकीभूत पंचत्व संख्या को पदान्तराभिहित पंचत्व संख्या का परिच्छेद्य मान लेना चाहिए, क्योंकि वह किसी संख्यान्तर से परिच्छेद्य नहीं, फलतः पंच पंचकाः'—ऐसा प्रयोग सम्भव हो जाता है।

समाधान—भाष्यकार उक्त शङ्का का अनुवाद करते हुए निराकरण का स्मरण दिला रहे हैं—"भवदपि इदं विशेषणं पंचसंख्याया एव भवेत्, तत्र चोक्तो दोषः।" अर्थात् यह कहा जा चुका है कि "उपसर्जनस्य विशेषणेनासंयोगात्"।"पञ्चजनाः"—इस समस्त पद में 'पंच'