भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानधारामें तो कार्य-कारणभाव
Line 12: है; परंतु दूसरी विज्ञानधाराके साथ दूसरी विज्ञानधाराका
Line 13: कार्य-कारणभाव नहीं है। जैसे कर्षित भूमिमें बोये
Line 14: हुए मधुर रससे भावित आम्र-बीजोंकी मधुरिमा
Line 15: अंकुर, काण्ड, स्कन्ध, शाखा, पल्लवादिद्वारा फलमें
Line 16: भी पहुँचती है, जैसे लाक्षारससे सींचे हुए कार्पास-
Line 17: बीजोंकी रक्तता अंकुरादि परम्परासे कपासमें पहुँचती
Line 18: है, वैसे ही जिस विज्ञान-सन्तानमें कर्म और कर्म-
Line 19: वासना आहित होती है, उसीमें फल भी होता है।
Line 20: यह भी ठीक नहीं है। कारण दोनों ही
Line 21: दृष्टान्तोंमें बीजोंका निरन्वय नाश नहीं होता है;
Line 22: किंतु बीजके ही सूक्ष्म अवयव भिन्न-भिन्न भावनासे
Line 23: भावित होकर फलादिरूपमें पूर्ण विकसित होते हैं;
Line 24: परंतु क्षणिकवादीके मतसे तो विज्ञानका निरन्वय
Line 25: नाश होता है। इसके सिवा जैसे पिपीलिकाओंसे
Line 26: भिन्न होकर उनकी पङ्क्ति नामकी कोई वस्तु नहीं
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