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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 752, कुल 778 में से

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पृष्ठ 752

परमतत्त्व समस्त प्रपंचका उपादान तथा निमित्त दोनों
ही कारण हो। इसीलिये प्रपंचकी—निमित्त, उपादान—
उभय-कारणता परमात्मामें ही समर्थन की जाती है।
अधिष्ठान-स्वरूप परमात्माके विज्ञानमें जब
प्रपंच-बुद्धि बाधित हो जाती है, तब उपादानता
निमित्तता भी परमात्मामें बाधित हो जाती है। ऐसी
स्थितिमें कार्य-कारणतीत शुद्ध रूपकी स्थिति होती
है। प्रपंचके प्रतीति-कालमें ही तमःप्रधान प्रकृति-
युक्त सच्चिदानन्दमें उपादानता और सत्त्व-प्रधान प्रकृति-
युक्त सच्चिदानन्दमें निमित्तता उपपन्न होती है। तम
आवरक है, अतः उससे सावरण सच्चिदानन्दमें जड़
प्रपंचके अनुरूप जड़ता भासित होती है। प्रकाशात्मक
सत्त्वके योगसे निरावरण स्वप्रकाशात्मक सच्चिदानन्दमें
कुलालादि निमित्त-कारणके अनुरूप सर्वविज्ञान होता
है। दोनों ही प्रकारकी प्रकृतिके अन्तर्गत है और मूल
प्रकृति भी ब्रह्ममें परिकल्पित है।
अधिष्ठानके बोधसे प्रकृति तत्कार्यात्मक प्रपंचका
बाध हो जाता है। भोग्य-वर्गका बाध स्वरूपसे ही
होता है। परंतु भोक्तृवर्गका बाध उपाधि तत्संसर्गके
बाधाभिप्रायसे ही होता है। इसी अभिप्रायसे ‘सर्वं
खल्विदं ब्रह्म’ (छान्दोग्य० ३।१४।१) इत्यादि
स्थलोंमें ‘योऽयं स्थाणुः पुमानेषः’ की तरह बाध-
सामानाधिकरणसे सर्व पदार्थका ब्रह्मके साथ अभेद
बोधन किया जाता है। और ‘तत्त्वमसि’ (छान्दोग्य०
६।८।७) इत्यादि स्थलोंमें ‘सोऽयं देवदत्तः’ की
तरह भाग-त्याग लक्षणाके द्वारा मुख्य सामानाधिकरण्यसे
‘त्वं’ पदार्थ जीवका ‘तत्’ पदार्थ ब्रह्मके साथ अभेद
बोधित होता है। ‘त्वं’ पदार्थ जीवके साथ अभेद
बिना ‘तत्’ पदार्थ परमात्मामें निरतिशय, निरुपाधिक
परप्रेमास्पदता, परमानन्दरूपता, स्वप्रकाशता आदि
ही नहीं सिद्ध हो सकती; क्योंकि जो पदार्थ अत्यन्त
सन्निहित है, वही स्वतः अपरोक्ष अर्थात् अन्यनिरपेक्ष
स्वप्रकाश होता है, और वही परम अन्तरंग एवं
अत्यन्त परिचित स्वप्रकाश होनेके कारण निरतिशय
प्रेमका आस्पद होता है। निरतिशय प्रेमास्पद ही
परमानन्दरूप हुआ करता है।
यदि तत्पदार्थ परमात्मा जीवसे भिन्न एवं तटस्थ
हो तो उसमें उपर्युक्त सब बातें नहीं बन सकतीं।
पृथिवी, आकाशादि बाह्य एवं देह, इन्द्रिय, मन,
बुद्धि, अहंकारादि आन्तर समस्त दृश्य पदार्थोंका
द्रष्टा सर्वप्रकाशक ‘त्वं’ पद लक्ष्यार्थ साक्षी ही होता
है। अहंकार, बुद्धि आदि सभी उसकी अपेक्षा
असन्निहित, बहिरंग, परतःप्रकाश, सातिशय, सोपाधिक
प्रेमके आस्पद ही हैं। ‘त्वं’ पद लक्ष्यार्थ सर्वद्रष्टा
साक्षी ही सबसे अन्तरंग सन्निहित है। जैसे अन्यान्य
पदार्थ सूर्यादिके प्रकाश-सम्बन्धसे प्रकाशमान होते
हैं, परंतु सूर्यादि स्वतःप्रकाशमान होते हैं, वैसे ही
बुद्धि, अहंकारादि अन्यान्य दृश्य-पदार्थ इस साक्षीके
सम्बन्धसे प्रकाशमान होते हैं और यह साक्षी
स्वतःप्रकाश होता है। यह ‘त्वं’ पद लक्ष्यार्थ स्वात्मा
ही सर्वान्तरंग है। यहाँ ही परम-सान्निध्यका भी
पर्यवसान होता है; क्योंकि अपनेसे परम-सन्निहित
अपना अन्तरात्मा ही हो सकता है। अन्य पदार्थोंमें
कुछ-न-कुछ देश, वस्तु आदिका व्यवधान रहनेसे
पूर्ण सान्निध्य नहीं बन सकता। देह, इन्द्रियादिकी
अपेक्षा कुछ सन्निहित (समीप होनेवाले) मन, बुद्धि,
अहंकार, ज्ञान, अज्ञान, सुखादि भी अप्रकाशमान
होकर नहीं रहते; किंतु ये जब कभी रहते हैं, तब
स्वप्रकाश साक्षीके संसर्गसे भासमान होकर ही रहते
हैं। सुख-दुःखादि हों और भासमान न हों, ऐसा
कदापि नहीं होता, तब फिर अत्यन्त सन्निहित
स्वान्तरात्मा अप्रकाशमान हो—यह कैसे हो सकता
है? ‘जो सर्वद्रष्टा सर्वभासक होता है, वह सदा-
सर्वदा अन्य प्रकाशसे निरपेक्ष स्वतःप्रकाशमान होता
है’ इसी अभिप्रायसे श्रुतिने कहा है कि जो सबको
जाननेवाला है, उसे किससे जानें—‘विज्ञातारमरे!
केन विजानीयात्’? (बृहदारण्यक० २।४।१४)
यदि भगवान् ही प्रत्यगात्मरूपसे भी विराजमान
हैं, तब तो उनमें उक्त श्रुतिके अनुसार स्वप्रकाशता
बन सकती है। जो व्यवधानरहित, अन्य प्रकाश-