भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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सुख एवं अज्ञानका व्यवहार होता है, उनको यह
बतलाना चाहिये कि ज्ञानाभावका ज्ञान कैसे होगा ?
अभावके ज्ञानमें अनुयोगी (अधिकरण) एवं प्रतियोगी
(जिसका अभाव हो)-का ज्ञान आवश्यक होता है।
जैसे घटाभाव जाननेके लिये अनुयोगी (घटाभावके
अधिकरण भूतलादि) तथा प्रतियोगी (घट) इन
दोनोंका ज्ञान आवश्यक होता है। अन्यथा किसका
अभाव कहाँ है, ऐसी जिज्ञासा शान्त नहीं होगी।
अनुभवगोचरता और आच्छादकताके
कारण अज्ञानकी भावरूपता
न कि ज्ञानाभावरूपता
यदि सुषुप्तिमें ज्ञानाभावके अधिकरण एवं
उसके प्रतियोगीका ज्ञान रहा हो, तब उस ज्ञानके
होते हुए वहाँ ज्ञानाभाव कैसे कहा जा सकता है ?
जिस भूतलमें कोई भी घट हो वहाँ घटाभावका
व्यवहार कैसे हो सकता है ? यदि सुषुप्तिमें ज्ञानाभावके
अनुयोगी एवं प्रतियोगीका ज्ञान नहीं था, तब तो उस
ज्ञानाभावकी अनुपलब्धि या प्रत्यक्षद्वारा कथमपि
ज्ञान नहीं हो सकता है।
अतः आत्मस्वरूपका आवरण करनेवाला अज्ञान
पूर्वकथनानुसार भावरूप ही है। जैसे सूर्यके आवरक
मेघका प्रकाश सूर्यसे ही होता है, वैसे ही नित्य
विज्ञानानन्दघन आत्माके आवरक अज्ञानका प्रकाश
साक्षीरूप आत्मासे ही होता है। अस्तु, इस प्रसंगका
स्पष्टीकरण अन्यत्र किया जायगा। प्रकृत प्रसंग यही
है कि सुषुप्तिदशामें निद्रा या अज्ञानसे समावृत
साक्षीद्वारा अज्ञानका प्रकाश होता है। अहंकार आदि
वहाँ नहीं होते। सुषुप्तिके अनन्तर प्रथम निद्राकी
निवृत्तिमें कुछ ऐसा ज्ञान होता है, जिसमें किसी
तरहके विशेष विकल्पका स्फुरण नहीं होता। यहाँ
दो स्थितियाँ हैं—विषय-विशेषके स्फुरणके बिना
बौद्धज्ञान होता है, जिसे व्यष्टि महत्तत्त्व कह सकते
हैं; जिसके अनन्तर अहंकारका उल्लेख होता है,
इसीलिये अज्ञानसे ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाती है।
सुषुप्तिमें अज्ञान ही होता है और उसके अव्यवहित
उत्तर जाग्रत् या स्वप्नमें ही कुछ ज्ञान होता है।
समष्टि अज्ञानरूप मायासे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती
है। जैसे अव्यक्तसे व्यक्तका प्रादुर्भाव है, वैसे ही
अज्ञानसे ज्ञानका प्रादुर्भाव होना युक्त ही है। उत्पन्न
व्यक्त ज्ञानके सिवा निद्राभंगके अनन्तर एक नित्य-
सिद्ध निरावरण ब्रह्मरूप अखण्ड बोधकी भी अभिव्यक्ति
होती है। तत्परतापूर्वक उसीके साक्षात्कारसे जीव
सदाके लिये बन्धनसे मुक्त हो जाता है। विवेकियोंका
कहना है कि आत्माके आवरण दो हैं—एक तो
दृश्यका स्फुरण और दूसरा अज्ञान। जाग्रत् स्वप्नमें
आत्मा विक्षेपरूप दृश्यसे समावृत रहता है और
सुषुप्तिमें अज्ञानसे आवृत होता है। जब समाधिमें
प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—इन
पाँचों वृत्तियोंका निरोध होता है अर्थात् जाग्रत्-
स्वप्न-सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत
तुरीयावस्थाका आविर्भाव होता है, तब निरावरण
विशुद्ध आत्मतत्त्वका दर्शन होता है। अज्ञानादि सब
दृश्योंकी जो प्रतीति या उसका भान किंवा प्रकाश
है, वही अखण्ड एवं अनन्त आत्मा है। बिना
प्रतीति, बिना भान, बिना प्रकाश किसी पदार्थका
अस्तित्व ही नहीं सिद्ध होता। जो पदार्थ है, वह
अवश्य ही केनचित् क्वचित्कथंचित् अर्थात् किसीसे,
कहीं, किसी प्रकार विज्ञात है, इसी वास्ते प्रतीतिके
भीतर ही समस्त देश, समस्त काल और समस्त
वस्तुएँ हैं। यह सर्वभासक, निर्मल, अखण्ड प्रतीति
ही परमात्मस्वरूप है।
यह अखण्ड प्रतीति आकाशकी तरह पोली
नहीं है, अपितु ठोस है। जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बका
स्फुरण होता है, वैसे ही इस प्रतीतिमें दृश्यका
स्फुरण होता है। जैसे बिना दर्पणकी प्रतीतिके
प्रतिबिम्बका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही बिना
स्वयंप्रकाशकी प्रतीतिके स्फुरण नहीं होता। अतएव
श्रुति है—‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा
सर्वमिदं विभाति ॥’ (श्वेताश्वतरो० ६।१४) जैसे
दर्पण-स्फुरणके पीछे प्रतिबिम्ब-स्फुरण होता है,