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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 732, कुल 778 में से

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पृष्ठ 732

नींदमें बाधक समझकर बालक और उसकी माँको
रोषके साथ खरी-खोटी सुनायी। परंतु प्रातःकाल
होनेपर जब उसे यह ज्ञात हुआ कि यह तो मेरी ही
स्त्री और मेरा ही पुत्र है, तब तो उनके साथ ही
वह अपने-आप भी रोने लगा। इस तरह विचार
करनेपर यही सिद्ध होता है कि निकृष्ट-से-निकृष्ट
वस्तुमें भी आत्माके स्वसम्बन्धकी घनिष्ठतासे प्रेमकी
अतिशयता और अत्यन्त उत्कृष्ट वस्तुमें भी
स्वसम्बन्धकी घनिष्ठता न होनेसे प्रेमकी न्यूनता
होती है। इतना ही नहीं, दूसरेकी उत्कृष्ट वस्तुमें द्वेष
या ईर्ष्या-पर्यन्तका संचार हो जाता है। तभी तो ये
कट्टर नवीन शैव-वैष्णव परस्पर एक-दूसरेके इष्टका
उत्कर्ष नहीं सहन कर सकते हैं।
अब सोचनेकी बात है कि जिसके सम्बन्धसे
निकृष्टमें भी लोकोत्तर प्रेम और जिसके सम्बन्धके
बिना परम उत्कृष्टमें भी द्वेष या ईर्ष्या होती है, वह
निरतिशय निरुपाधिक प्रेमका आस्पद है कि नहीं।
जब शर्कराके सम्बन्धसे स्वभावतः माधुर्य-शून्य
पदार्थोंमें भी मधुरिमाका अनुभव होता है, तब क्या
शर्करामें मधुरिमाका अभाव कहा जा सकता है?
जब स्वस्वरूप आत्माके सम्बन्धसे प्रेमके अयोग्य
पदार्थोंमें भी प्रेम होता है, तब क्या आत्मामें
अन्यशेषता या प्रेमकी अपकर्षता कही जा सकती
है? प्रत्युत स्पष्ट रूपसे यही कहा जा सकता है कि
आत्माके सन्निहितमें प्रेमका आधिक्य और विप्रकृष्टमें
प्रेमकी न्यूनता होती है। तभी देखते हैं कि प्रियतम,
कलत्र एवं पुत्रकी रक्षाके लिये अनेकानेक प्रयत्नसे
उपार्जन की हुई रत्नादि सम्पत्तियोंको त्याग देनेमें
विलम्ब नहीं होता, किंतु कलत्र, पुत्र प्रभृति यदि
अपने शरीरके प्रतिकूल प्रतीत होते हैं तो अप्रिय ही
नहीं, अपितु शत्रु समझे जाते हैं।
किसी गृहमें अग्नि लग रही है, पता चलता
है कि अत्यन्त प्रिय पुत्र गृहके भीतर रह गया है।
गृहपति अत्यन्त व्याकुल होता है, रुदन करता है,
लोगोंसे कहता है—'भाई, चाहे कोई हमारा समस्त
धन-धान्य रत्नादि ले ले, परंतु हमारे प्रिय पुत्रको
जलते हुए भवनसे निकाल लाये।' यह सब कुछ
होते हुए भी अपना शरीर इतना प्रिय है कि कोई
अत्यन्त धनके लोभसे भी उसका नाश नहीं सहन
कर सकता। जिसका प्रिय पुत्र है, वह स्वयं जलते
हुए घरमें प्रवेश नहीं करता; केवल बाहर दूर खड़ा
तड़फड़ाता है। ठीक ही है, संसारके समस्त नाते
इस देहके ही साथ हैं, उसके नष्ट होनेपर समस्त
नाते मिट जाते हैं। नहीं तो इस अपार संसारमें
अनन्त जन्मके देह-सम्बन्धियोंका यदि स्मरण रहे
तब कितनी माताएँ, कितने पिता और कितने पुत्र-
कलत्रादि कुटुम्बी कहाँ-कहाँ हैं, उन सभीके सुख-
दुःखमें कितना सुख-दुःख देखना (भोगना) पड़े।
एक ही जन्मके कुटुम्बियोंके सम्बन्धमें क्या दशा हो
रही है। अस्तु, देहके नष्ट होते ही स्त्री, पुत्र, धन-
धान्य तथा अखण्ड साम्राज्यसे सम्बन्ध छूट जाता
है। कदाचित् दूसरे जन्ममें किसीको स्मरण भी रहे
कि यह साम्राज्य और विशाल धवलधाम सब मेरे
ही हैं। पर अब बिना वर्तमान अधिपतिकी आज्ञाके
उसे अपने ही निर्मित उस धवलधाममें प्रवेश
करनेका अधिकार नहीं है और गत जन्ममें उसके
नियुक्त भृत्य ही उसे प्रवेश नहीं करने देते हैं। ठीक
है, देहतक ही समस्त सांसारिक सम्बन्ध हैं। अतः
समस्त पुत्र, कलत्रादि बहिरंग पदार्थोंकी अपेक्षा देह
प्रिय होती है। ऐसे ही देहकी अपेक्षा इन्द्रियाँ,
उनकी अपेक्षा मन, मनकी अपेक्षा बुद्धि एवं बुद्धिसे
भी अहमर्थ और उससे भी अन्तरंग विशुद्ध चिदात्मा
प्रिय है।
इन्द्रिय-शक्तिके बिना शरीर मृतकप्राय हो
जानेके कारण भाररूप हो जाता है। जब मन किन्हीं
कांचन, कामिनी प्रभृति विषयोंकी ओर खिंच जाता
है, तब प्राणी मनःसन्तोषार्थ देह और इन्द्रियोंकी भी
परवाह नहीं करते। किसी प्रकारकी अकीर्ति आदिसे
यदि मनको उद्वेग होता है, तब देहादि-त्यागके लिये
विष या शस्त्रका प्रयोग किया जाता है। जब प्राणी