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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 717, कुल 778 में से

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पृष्ठ 717

क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? ७०७

उठ गया है। गिरते समय प्राणीके हाथ-पाँव यद्यपि
स्वभावसे ही किसी सहारेको टटोलने लगते हैं और
दुनियाके सम्पूर्ण सहारोंके कमजोर होनेपर, एकमात्र
भगवान्‌का ही बल रह जाता है। अतः स्वाभाविक
रूपसे भगवान्‌का आश्रयण ही शेष रह जाता है। फिर
भी जब ब्रह्मा, शेष आदिके कहनेपर भी भगवान्‌के
पुकारनेमें विश्वास न हो तो इसे राष्ट्रका दुर्भाग्य ही
समझना चाहिये। रहा यह कि जप, पाठ, पूजा करते
हुए भी सोमनाथका मन्दिर टूट गया, विश्वनाथ भाग
गये, हिन्दू जातिका सर्वस्व लुट गया; फिर ईश्वर या
धर्मको पुकारनेसे क्या लाभ ? परंतु यदि ठण्डे दिलसे
विचार करें तो इस शंकाका कुछ भी महत्त्व नहीं है।
पहले तो यह सोचना चाहिये कि क्या किसी उपायके
कभी असफल हो जानेमात्रसे, सर्वदाके लिये उसे
व्यर्थ और बेकाम समझ लेना उचित है ? क्या कभी
वायुयानके फेल हो जाने या किसी यन्त्रके कल-
पुर्जोंके बेकार हो जानेपर सर्वदाके लिये उनको बेकार
समझ लिया जाता है ? देखते तो यह हैं कि बार-
बार वायुयानों, मोटरों, रेलों तथा अन्यान्य यन्त्रोंके
बेकार या हानिकारक होनेपर भी उनका निर्माण और
संचालन बन्द नहीं हुआ। बड़े-बड़े आविष्कारक
वैज्ञानिक बार-बार विफल होनेपर भी प्रयत्नका पीछा
नहीं छोड़ते, फिर लाखों सफलताके भी तो उदाहरण
विद्यमान हैं, फिर उनके आधारपर विश्वास ही क्यों
न किया जाय ?
असफलताका कारण कोई त्रुटि ही समझी
जाती है। किसी यन्त्रके एक छिद्र या कीलोंकी
गड़बड़ी या कमी-वेशीसे वह व्यर्थ या हानिकारक
हो सकता है। इसी तरह जो कार्य-कारण-भाव
अपौरुषेय अतएव भ्रम-प्रमादादि स्पर्शसे शून्य, प्रामाणिक
शास्त्रसे सिद्ध है, कतिपयस्थलीय व्यभिचारदर्शनमात्रसे
उसका विघटन नहीं समझा जा सकता। जैसे वैज्ञानिक-
निर्दिष्ट पद्धतिसे विपरीत किंचित् भी उलट-फेर
होनेपर यन्त्र-संचालन और निर्माण व्यर्थ ही नहीं,
हानिकारक समझे जाते हैं, वैसे ही शास्त्र-निर्दिष्ट
पद्धतिमें किंचित् भी गड़बड़ी होनेपर जप, पाठ, पूजा
आदि धर्म बेकार या हानिकारक हो सकते हैं; परंतु
इतनेमात्रसे ही उन शास्त्रोंका अप्रामाण्य या उन जप,
पाठ, पूजाओंमें सर्वदाके लिये अश्रद्धा कदापि उचित
नहीं। जब अनेक स्थलोंमें वैज्ञानिक-निर्दिष्ट पद्धतिसे
काम करनेपर सफलता देखी जा चुकी है, तब तो
स्पष्ट ही है कि जहाँ कहीं यन्त्रोंकी विफलता या
हानिकारकता देखी जाय, वहाँ संचालन, निर्माणमें ही
कर्तृ-क्रियादिकी विगुणता या अन्यान्य किसी प्रकारकी
त्रुटिकी ही फल-बलसे कल्पना करना उचित है।
इसी तरह जप, पाठ, पूजा आदि किन्हीं भी प्रामाणिक
शास्त्रोक्त उपायोंको जब अनेक स्थलोंमें सफल होते
देख रहे हैं तो कतिपय स्थलोंमें व्यर्थता देखकर
फल-बलसे ही उनके अनुष्ठानमें या साधनोंमें या
कर्ताओंमें अवश्य ही किसी प्रकारकी त्रुटि समझ लेनी
चाहिये। चिकित्सकोंके शास्त्रोक्त अनेक उपाय कहीं
व्यर्थ हो जाते हैं, साथ ही कहीं हानिकारक भी
साबित होते हैं तो भी वे उपाय सर्वदा व्यर्थ और
सर्वदाके लिये हानिकारक हैं, यह समझना भारी भूल
है। किंतु यही समझना उचित है कि जब यह अनेक
स्थलोंमें सफल होते हैं तो प्रयोक्ता या प्रयोगकी ही
कोई त्रुटि होनेसे कहीं विफल होते हैं। इस तरह
सहजहीमें समझा जा सकता है कि जब अनेक जगह
पूजा, पाठ, जप आदिकी सफलता प्रत्यक्ष ही देखी
जाती है, फिर भी कहीं सोमनाथ आदि स्थलोंमें यदि
पूजादिकी व्यर्थता हुई तो इससे प्रयोक्ताओं या
प्रयोगोंमें ही त्रुटिकी कल्पना कर लेनी चाहिये, न कि
पूजादि उपायोंको ही सर्वदाके लिये व्यर्थ और
हानिकारक मान लेना चाहिये। अध्यक्षों और पूजकोंके
अत्याचारों, अनाचारों और मन्दिरोंके अपचारोंसे मूर्तिमेंसे
देव-तत्त्व हट जाता है। अनुष्ठानोंमें, मन्त्रोच्चारणमें
किसी तरहकी गड़बड़ी या अनुष्ठाताओंके आचार-
विचारोंमें गड़बड़ीसे अनुष्ठान व्यर्थ और हानिकारक
हो सकते हैं; परंतु इतनेसे ही सब अनुष्ठान वैसे ही
नहीं समझे जा सकते। इसके सिवा जैसे दो मल्लोंके