भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञान और भक्ति ६८३
श्रेष्ठ है—'मय्यावेश्य मनो ये माम्' (गीता १२।२)
द्वितीय पक्षको लेकर कहा गया है—'ते प्राप्नुवन्ति
मामेव' (गीता १२।४) अर्थात् निर्गुणोपासना तो
मुझे प्राप्त ही है। यहाँ 'एव' का सम्बन्ध 'प्राप्नुवन्ति'
के साथ है; क्योंकि उपासनाके अनुसार उपासक
उपास्यको प्राप्त होता ही है। अतः 'मां' के साथ
'एव' का सम्बन्ध व्यर्थ होकर 'प्राप्नुवन्ति' के साथ
ही एवकार का सम्बन्ध होता है। तब उससे
व्यवच्छेद होता है। तब सारांश यह निकलता है कि
निर्गुणोपासक तो भगवान्को प्राप्त ही है, फिर
भगवत्प्राप्तिके उत्कर्षापकर्षका क्या प्रश्न? यहाँ
प्रसंगानुसार 'अस्मद्', 'मां' आदिका कहीं निर्गुण
ब्रह्म और कहीं सगुण ब्रह्म अर्थ होता है; क्योंकि
भगवान् निर्गुण भी हैं और सगुण भी हैं—
एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥
(रा०च०मा० १।२३।४; १।११६।३)
'मय्यावेश्य' इत्यादि स्थलोंमें 'मयि' का अर्थ
सगुण साकार सच्चिदानन्द ब्रह्म अर्थ है। 'ते प्राप्नुवन्ति
मामेव' यहाँपर 'मां' पदका अर्थ निर्गुण ब्रह्म है।
क्योंकि 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।'
(गीता ४।११) सिद्धान्तके अनुसार सगुणोपासकोंको
जैसे भगवान् सगुणरूपसे प्राप्त होते हैं, वैसे ही
निर्गुणोपासकोंको निर्गुणरूपसे प्राप्त होते हैं। 'ये
त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तम्' (गीता १२।३) इस प्रसंगमें
निर्गुणोपासनाका प्रकृत होना स्पष्ट है। अतः वैसे
उपासकको निर्गुणब्रह्मकी प्राप्ति युक्त ही है। इस
दृष्टिसे यहाँ 'मां' का अर्थ निर्गुणब्रह्म मानना ही
युक्त है। इसीलिये फलदृष्टिसे निर्गुणोपासना श्रेष्ठ है।
सरलताकी दृष्टिसे सगुणोपासना श्रेष्ठ है।
कुछ लोग कहते हैं कि यहाँका प्रश्नोत्तर ऐसा है,
जैसे किसीने प्रश्न किया—'यमुनाजल श्रेष्ठ या
गंगाजल?' इसका उत्तर दिया गया 'यमुनाजल श्रेष्ठ
है।' जब फिर गंगाजलके बारेमें पूछा गया, तब कहा
गया कि 'गंगाजल तो अमृत है।' जलोंमें यमुनाजल
श्रेष्ठ है। ठीक वैसे ही सगुणोपासना श्रेष्ठ है या
निर्गुणोपासना? इसके उत्तरमें कहा गया कि सगुणोपासना
श्रेष्ठ है। निर्गुणोपासक तो उपास्यस्वरूप ही होता है।
'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' अतः उसके उत्कर्षापकर्षका
प्रश्न व्यर्थ है। ऐसे कालिदास और दण्डी कविके
उत्कर्षके प्रश्नपर सरस्वतीने कहा—'कविर्दण्डी
कविर्दण्डी।' कालिदासने जब पूछा कि मैं? तब तो
सरस्वतीने कहा—'त्वन्त्वहमेव' तुम तो हमारे स्वरूप
ही हो। इसी तरह सूरदाससे प्रश्न हुआ कि कविता
आपकी श्रेष्ठ या तुलसीदासजीकी? उन्होंने उत्तर
दिया—'हमारी कविता श्रेष्ठ है, तुलसीदासजीकी
कविता तो कविता नहीं, अपितु मन्त्र है।' निर्गुणोपासनासे
निर्गुणब्रह्मका ज्ञान फिर भी पृथक् ही है। निर्गुण ब्रह्म-
ज्ञानका साक्षात्कार तो दोनों ही उपासनाओंका अन्तिम
फल है। वेदान्तियोंका श्रवण, मनन और निदिध्यासन
करके ब्रह्म-साक्षात्कारका पन्थ ज्ञानमार्ग है। तात्पर्य-
निर्णय एवं मननादिमें प्रयत्न करके आचार्यमुखसे
निर्गुण-स्वरूप जानकर श्रद्धासे उसीकी निरन्तर उपासना
करना यह निर्गुणोपासना है। 'अन्ये त्वेवमजानन्तः
श्रुत्वान्येभ्य उपासते।' (गीता १३।२५)
अतः यहाँ ज्ञान और भक्तिकी उत्कृष्टता-
अपकृष्टताका प्रश्न ही नहीं है। साथ ही सांख्य और
योगके भी उत्कर्षापकर्षका प्रश्न नहीं समझना चाहिये,
क्योंकि सांख्यका अर्थ ज्ञाननिष्ठा और योगका अर्थ
कर्मनिष्ठा है। अतः इनका भी विषय यहाँ नहीं है,
बल्कि निर्गुणोपासना और सगुणोपासना दोनों ही यहाँ
कर्मनिष्ठाके भीतर ही हैं; क्योंकि पुरुषतन्त्र मानसी
ध्यानादि क्रिया भी कर्म है, अतः विद्यारण्यने अपनी
पंचदशीमें इसे योग माना है। कहा भी है—
'यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते' (गीता
५।५) अर्थात् ज्ञाननिष्ठोंको जो निर्गुण ब्रह्मपद प्राप्त
होता है, योगियोंको भी अर्थात् निर्गुण ब्रह्मोपासकोंको
भी साक्षात्कारक्रमेण वही पद प्राप्त होता है।
निर्गुणोपासनाकी महिमासे भी निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार
माना जाता है। फिर भी वह विधुरपरिभावित कामिनीके