भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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सर्वान्तरात्मा हैं, वे ही सम्पूर्ण वस्तुओंके अन्तिम
स्वरूप हैं। वस्तुओंका अन्तिम रूप अपना कारण
अव्याकृत तत्त्व है। उस अव्याकृतकी भी अन्तिम
पर्यवसान-भूमि श्रीकृष्ण हैं; क्योंकि कारणसे भिन्न
कार्य और अधिष्ठानसे भिन्न कल्पित नामकी कोई
वस्तु ठहरती ही नहीं है—
सर्वेषामपि वस्तूनां भावार्थो भवति स्थितः।
तस्यापि भगवान् कृष्णः किमतद् वस्तु रूप्यताम्॥
(श्रीमद्भा० १०।१४।५७)
वे ही निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद
हैं, वे ही अन्तरात्मा हैं, अतः सच्चा प्रेम उन्हींमें ही
होना चाहिये। हाँ, सहज, स्वाभाविक प्रेम भी बिना
जाने असत्-सा हो जाता है। जैसे छात्राध्ययनके
शब्दोंके बीच मिले हुए अपने पुत्रके अध्ययनके
शब्दका विविक्त स्पष्ट रूपसे प्राकट्य नहीं होता, वैसे
ही आत्मप्रेम प्राणिमात्रमें होनेसे आत्माकी परमानन्दरूपता
प्रतीत होनेपर भी अविद्याके कारण उसका स्पष्ट
प्राकट्य नहीं होता है। परंतु इस तरह प्राणी अज्ञात
रूपसे तो आत्मप्रेमी है ही। अतएव प्राणिमात्र ज्ञानसे,
अज्ञानसे, किसी-न-किसी तरह अपने जीवनधन
भगवान्का अवश्य ही प्रेमी है। जिसे जितना बोध है,
उसे उतना ही प्राकट्य है। जहाँ वह प्रेम सम्यक्रूपसे
प्रकट है, वहाँ परिपूर्ण ऐश्वर्य भी नतमस्तक हो जाता
है। इसीलिये कहा जाता है कि महत्परिमाण-
परिमिति-प्रेमवती व्रजांगनाओंके सामने ऐश्वर्य अपना
प्रभाव नहीं डाल सका। कभी श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई
व्रजांगनाओंको जब अकस्मात् कृष्ण किसी निकुंजमें
मिल गये, तब कृष्ण अपनेको छिपानेके लिये अनन्त
ऐश्वर्यपूर्ण श्रीमन्नारायणके रूपमें प्रकट हो गये।
गोपांगनाओंने उन्हें प्रणाम किया, परंतु उनसे माँगा
यही कि आप कृपा करके हमारे मनमोहन कृष्णचन्द्रको
मिला दो। वे उस नारायणरूपपर मोहित नहीं हुईं और
श्रीवृषभानुनन्दिनीके पधारते ही वह ऐश्वर्यपूर्ण रूप
टिक ही नहीं सका, सहसा कृष्णरूप प्रकट हो गया।
निरुपाधिक प्रेम सर्वातिशायी प्रेम है तथापि प्रेम-
प्राकट्यमें लौकिकताकी अपेक्षा अधिक होती है।
इसीलिये देखते ही हैं कि प्राणियोंको जितना स्वारसिक
प्रेम अपने पुत्र, कलत्र, धन-धान्यादिमें होता है, उतना
स्वारसिक प्रेम देवता या भगवान्में नहीं होता।
इसीलिये परिपूर्ण परमात्मा प्राणि-कल्याणार्थ अपनी
अलौकिकताको छिपाकर लौकिक रूप ग्रहण करते हैं।
भक्तोंने भी भक्तिके दो रूप माने हैं, एक
वैधी, दूसरी रागानुगा। विधिसे प्राप्त भक्ति वैधी
है। 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ' के अनुसार अप्राप्तिमें
ही विधि होती है। समझा जाता है कि जहाँ
स्वारसिक, रागानुगामी नहीं है, वहीं विधिकी अपेक्षा
होती है। किं बहुना माता-पिता, गुरुजनों एवं लौकिक
विषयोंमें भी विधिक संस्पर्श है, अतः वहाँ भी
स्वारसिक प्रीतिमें कुछ कमी हो जाती है। उन
सबकी अपेक्षा पत्नीमें प्रीति स्वाभाविक है। पत्नीके
प्रति प्रीतिमें भी 'मातृदेवो भव', 'पितृदेवो भव',
'आचार्यदेवो भव' के समान ही 'स्वदारनिरतो
भव' इस विधिक संस्पर्श है, अतः वहाँपर भी
स्वारसिक प्रेम नहीं है। जहाँ स्वारसिक प्रेम है,
वहाँ निषेध होता है। जैसे बहते जलमें बाँध
बाँधनेसे वेग उत्कट हो जाता है, वैसे ही स्वाभाविक
प्रेममें निषेध या रुकावट डालनेसे वह भी उत्कट
रूप धारण करता है। इसीलिये प्रेमियोंने कहा है—
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥
(रा०च०मा० ७।१३० (ख))
अर्थात् हे नाथ! जैसे लोभीको धन और
कामुकको कामिनीमें प्रीति होती है, आपके श्रीचरणोंमें
मुझे वैसी ही प्रीति होनी चाहिये।
उच्चकोटिका ज्ञान भी प्रेमके बिना
सुशोभित नहीं होता
लोकमें उपाधिको लेकर होनेवाले प्रेमकी यह
दशा है। सर्वोपाधिविनिर्मुक्त होनेपर स्वाभाविक
स्वान्तरात्मा चैतन्याभिन्न परमात्मा भगवान्में तो
स्वाभाविक प्रेम ही अनन्त है, क्योंकि वहाँ तो भगवान्