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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 626

६१६ भक्तिसुधा
कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म स्थित है। यह अन्तिम
तत्त्व ही अद्वितीय अनन्त शुद्ध बोधरूप है। इसका
ही विवर्त समस्त चराचर प्रपंच है। यदि सर्वाधिष्ठान
होनेके कारण इसे सर्वनिवासस्थान भी कहें तो भी
कोई हानि नहीं। इसी अंशका स्पष्टीकरण भागवतके
इन पद्योंमें किया गया है—
ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्मनिर्गणम्।
अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणा॥
(श्रीमद्भा० ३।३२।२८)
एक अद्वितीय नित्य बोध ही भ्रान्तजनोंको अविद्या-
प्रत्युपस्थापित बहिर्मुख इन्द्रियाँ तथा मन-बुद्धि आदि
द्वारा शब्दादि-धर्मक प्रपंचरूपसे भासित होता है।
श्रीमद्भागवतने भी श्रीकृष्णको परब्रह्म ही कहा है—
अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्।
यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्॥
(श्रीमद्भा० १०।१४।३२)
अतः पूर्वोक्त अर्थ ही श्रेष्ठ है और वही
अव्यभिचार भक्तियोग है।

सबसे सगे भगवान्

जीवात्मा सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका
अंश है। जैसे घटाकाश, महाकाश; शरावाकाशके
भीतर, बाहर, मध्यमें महाकाश, कटक, मुकुट, कुण्डल
आदिके भीतर, बाहर, मध्यमें सुवर्ण और तरंगके
भीतर, बाहर, मध्यमें जल विद्यमान है; वैसे ही चेतन,
अमल, सहज सुखराशि जीवात्माओंके भीतर, बाहर,
मध्यमें सच्चिदानन्द परमात्मा विद्यमान हैं। इस दृष्टिसे
जीवात्मा भगवान्का पुत्र, अंश एवं स्वरूप है। जैसे
शूकर-कूकुरके बच्चे शूकर-कूकुर होते हैं, सिंहके
बच्चे सिंह होते हैं, वैसे ही 'अमृतस्य पुत्राः,'
(श्वेताश्वतर० २।५) 'ममैवांशो जीवलोके'
(गीता १५।७) इत्यादि श्रुतिस्मृतिके अनुसार भगवान्के
पुत्र या अंश जीवात्मा भगवान्के स्वरूप ही ठहरते
हैं। जैसे निर्मल जल पृथ्वीपर पड़ते ही मलिन हो
जाता है, वैसे ही शुद्ध चिदात्मा मायाके संसर्गसे
मलिन हो जाता है। भगवान् जीवोंके परम अन्तरङ्ग
और घनिष्ठ सम्बन्धी हैं। संसारकी सब वस्तुओंका
वियोग अनिवार्य है। कलत्र, पुत्र, मित्र, क्षेत्र सभी
वस्तुओंके साथ जीवात्माका सम्बन्ध गौण ही है।
मुख्य सम्बन्ध तो भगवान्का ही है। जीवात्मा स्वर्ग,
नरक जहाँ भी जाय, भगवान् ही उसके साथ होते हैं
और सभी लोग सम्बन्ध तोड़ लेते हैं। अघासुरके
मुखमें ग्वालबाल प्रविष्ट हो गये, उसके विषसे उन्हें
जलते हुए देखकर प्रभु श्रीकृष्ण भी प्रविष्ट हो गये।
संसारमें है किसीकी प्रीति या शक्ति ऐसी, जो एक
साँपके मुखमें पड़े पुत्र या मित्रके साथ स्वयं भी
जाय ? किसी स्त्रीका पुत्र कूपमें गिरता है, वह कूपके
तटपर खड़ी होकर चिल्लाती है—'दौड़ो, दौड़ो, बच्चेको
निकालो' पर कूपमें उतरनेकी हिम्मत उसकी