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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 615

इष्टदेवकी उपासना
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मंगलमय स्वरूपको धारण करते हैं।
उपनिषदोंमें दहर-विद्या, शाण्डिल्य-विद्या,
वैश्वानर-विद्याओंके रूपमें इनकी ही अनेक सगुण
उपासनाएँ विस्तीर्ण हैं। ये ही भगवान् विघ्नराज
श्रीगणेशके रूपमें ऋद्धि-सिद्धि आदि निज शक्तियोंसहित
आराधित होकर भक्तोंका सर्वविघ्ननिवारण, सर्वाभीष्ट-
सम्पादनपूर्वक स्व-स्वरूप साक्षात्कार कराकर परम
गति देते हैं और ये ही विश्वचक्षु भगवान् भास्करके
रूपमें उपास्य होकर सर्वरोगनिवारणपूर्वक अपने
पारमार्थिक विशुद्ध ब्रह्मस्वरूपका साक्षात्कार कराकर
भवरोगसे मुक्त कर देते हैं। ऐसे ही ये ही वेदान्तवेद्य
शुद्ध भगवान् अविद्याशक्तिप्रधान होकर प्रपंचका
निर्माण करते हैं, विद्याशक्तिप्रधान होकर मोक्ष प्रदान
करते हैं और अनन्त अखण्ड विशुद्ध चिति-शक्ति-
रूपसे सर्व दृश्यके अधिष्ठानरूप विराजमान होते हैं।
वे ही महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि
रूपमें उपास्य होकर सर्वभुक्ति-मुक्ति-प्रदायक होते
हैं। वे ही विशुद्ध ब्रह्म, भूतभावन भगवान् विश्वनाथ,
श्रीविष्णु, नृसिंह एवं श्रीमद्राघवेन्द्र रामभद्र तथा
श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दरूपमें उपासित होकर
सर्वसिद्धि प्रदान करते हैं। अस्तु—
श्रौत-स्मार्तप्रतिपादित स्वधर्मका सम्पादन
परमेश्वरका आराधन है
इन सभी स्वरूपोंकी गायत्र्यादि वैदिक मन्त्रों
एवं वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्तकर्मोंद्वारा की गयी
उपासना मुख्य है। वेदशास्त्रोक्त स्वधर्म-कर्मके
अनुष्ठानके बिना पाशविकी उच्छृंखल चेष्टाओंका
अन्त नहीं होता। बिना श्रौत-स्मार्तशृंखलाबद्ध
चेष्टाओंके इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदिका नियन्त्रण
असम्भव है और बिना सर्व करण-रोधके अदृश्य
विशुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार भी असम्भव है। अतः
श्रौत-स्मार्त-कर्म-धर्मद्वारा ही परमेश्वरका मुख्य
आराधन है।
इसी विशुद्ध वैदिक धर्मका बौद्ध आदि अवैदिक
एवं वैदिकाभासोंद्वारा विप्लव होनेपर भगवान्
शंकराचार्यने अवतीर्ण होकर उसे पुनः प्रतिष्ठित
किया है। श्रीविद्यारण्यप्रभृति विद्वानोंने तथा अन्यान्य
प्राचीन-अर्वाचीन सन्तोंने भी इसी मतका पोषण
किया है। ज्ञानेश्वर, तुकाराम, तुलसीदासने भी इसी
परम उदार सिद्धान्तका पोषण किया है। उसमें तीनों
वर्णोंके लिये गायत्री मुख्य उपास्य है। जिनके लिये
गायत्रीका अधिकार नहीं है, उन अवैदिकोंके लिये
अवैदिकी उपासनाएँ हैं। जो गायत्रीमन्त्रके अधिकारी
त्रैवर्णिक वैदिकसंस्कार-सम्पन्न हों, उन्हें यदि गायत्रीमें
परितोष न हो तो विष्णु, शिव आदि देवताओंका
विष्णु, शिव आदि मन्त्रोंसे आराधन कर सकते हैं।
वैदिकसंस्कार-सम्पन्न होनेके कारण इन मन्त्रोंमें
उनका अधिकार सहज सिद्ध है। अर्थात् गणेश, शिव,
शक्ति, विष्णु तथा सूर्य—इन पंच देवताओंकी, किंवा
अन्य सगुण एवं निर्गुण ब्रह्मकी उपासना गायत्रीमन्त्रद्वारा
ही पूर्ण सुसम्पन्न हो सकती है और इसके सिवा
वैदिक शिव, विष्णु आदि मन्त्रोंसे भी तत्तत् उपासनाएँ
हो सकती हैं।
इन समस्त वैदिक उपासनाओंमें वर्णाश्रमानुसार
श्रौत-स्मार्तधर्मका अनुष्ठान भी परमावश्यक है। वेदने
उपासनाविहीन कर्मोंको स्वप्रकाश ब्रह्मकी अपेक्षा
स्वर्गादि तुच्छ फलके देनेवाले होनेसे अन्धतमकी
प्राप्तिका कारण कहा है। परंतु कर्मविहीन उपासनाओंसे
तो घोर अन्धतमकी प्राप्ति कही गयी है; क्योंकि
स्वधर्मानुष्ठानके बिना इष्टमें चित्तकी एकाग्रतारूप
उपासना भी सम्पन्न न हो सकेगी।
स्वधर्मभ्रष्टके लिये कहा गया है कि चाहे
कितना भी श्रीहरिकी भक्ति, किंवा ध्यानमें तत्पर क्यों
न हो, परंतु यदि आश्रमके आचारोंसे भ्रष्ट है तो वह
पतित ही कहा जाता है। यथा—
हरिभक्तिपरो वापि हरिध्यानपरोऽपि वा।
भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात्पतितः सोऽभिधीयते ॥
(बृहन्नारदीयपु० ४।२४)
अतः चाहे वैष्णव हो, चाहे शैव हो—सबको
वेदशास्त्रोक्त स्वधर्मका अनुष्ठान आवश्यक है। द्विजोंके