सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 589

निराकारसे साकार ५७९
ही दिव्य लीलाशक्ति परमात्म-स्वरूप दर्शनमें सहायक
होती है, अन्य राजसी, तामसी शक्तियाँ प्रतिबन्धक
होती हैं।
साकाररूपमें किसी भी भावसे चित्त
लगानेसे प्राणीका कल्याण
कोई तो प्रकृतिसे पृथक् ही भगवान्‌की अन्तरंगा
शक्ति मानते हैं, कोई महाशक्तिके अन्तर्गत होनेपर भी
उसे दिव्य मानते हैं। जैसे गुलाबके बीजमें कण्टक,
पत्र, नाल, स्कन्धादिकी उत्पादिनी शक्तिसे सौन्दर्य-
माधुर्य-सौरस्य-सौगन्ध्य-सम्पन्न फूलको उत्पन्न करनेकी
शक्ति विलक्षण होती है, वैसे ही प्रपंचोत्पादिनी
अन्यान्य शक्तियोंकी अपेक्षा सगुण, साकार भगवान्‌के
प्राकट्यानुकूला लीलाशक्तिमें चमत्कारपूर्ण विलक्षणता
रहती है। सारांश यह है कि शुद्ध परब्रह्म ही निराकार
रूपसे ही सगुण, साकार रूपमें प्रकट होते हैं। तभी
उनको भाव, कुभाव, अनख, आलस किसी तरहसे भी
भजनेसे प्राणियोंकी सद्गति हो जाती है। इसीलिये
कहा है—
नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप।
अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः॥
(श्रीमद्भा० १०।२९।१४)
अर्थात् प्राणिमात्रके कल्याणार्थ अव्यय, अप्रमेय,
निर्गुण, गुणान्तरात्मा भगवान्‌का साकार स्वरूपमें
प्राकट्य होता है। इस स्वरूपमें काम, क्रोध, स्नेह,
किसी तरह भी चित्त लगानेसे प्राणीका कल्याण हो
जाता है—
कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥
(श्रीमद्भा० १०।२९।१५)
ठीक ही है, जैसे कोई चिन्तामणिको दीपक
समझकर उसे लेने चले तो भी वहाँ दीपक नहीं, अपितु
चिन्तामणि ही मिलेगी, वैसे परात्पर, पूर्णतम, पुरुषोत्तम,
शुद्ध सच्चिदानन्द परब्रह्मको कोई जार समझकर, कोई
शत्रु, मित्र, कुछ भी समझकर प्रवृत्त हो, परंतु वहाँ
मिलेगा शुद्ध परब्रह्म परमात्मा ही, प्राकृत वस्तुकी
प्राप्ति नहीं होगी। अतएव कुछ व्रजांगनाएँ जारबुद्धिसे
भी कृष्णको भजकर मुक्त हो गयीं—
तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः।
जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥
(श्रीमद्भा० १०।२९।११)
पति, भ्राता आदिसे अवरुद्ध होनेके कारण कुछ
व्रजांगनाएँ मदनमोहनके वेणुनादसे आकर्षित होनेपर
वृन्दावनचन्द्र कृष्णचन्द्रके पास न जा सकीं। वे
कृष्णकी भावनासे भावितमनस्का होकर, आँख मींचकर
वहीं ध्यान करने लगीं। प्रियतम कृष्णके दुःसह
विरहजन्य तीव्रतापसे उनके अशुभ कर्म विधूत हो उठे
और ध्यानप्राप्त अच्युतके आश्लेष (परिरम्भण)-
जन्य आनन्दोद्रेकसे सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका भी फल
समाप्त हो गया अथवा उनके दुःसह, प्रेष्ठ-विरहजन्य
तीव्रतापसे विश्वके ही अशुभ कर्म काँप उठे और
ध्यानप्राप्त अच्युतके आश्लेषसे संसारके सम्पूर्ण मंगल
अपनेको कम जानकर दुर्बल हो गये। इस तरह
सद्यःप्रक्षीणबन्धना होकर जारबुद्धिसे भी उन्हीं
परमात्माको प्राप्त होकर वे व्रजांगनाएँ गुणमय पंचकोशों
या तीनों देहोंसे मुक्त हो गयीं।
सगुणस्वरूपका चिन्तन सरल एवं सुगम
भावुकोंने तो इस सगुण स्वरूपके चिन्तनको
सरल, सुगम, श्यामीभूत ब्रह्म ही बतलाया है।
अद्वैतसिद्धिकारका ही कहना है कि जो लोग निर्गुण,
निराकार, निर्विकार ब्रह्मकी उपासना, ध्यानाभ्यासवशीकृत
मनसे करते हैं, वे करें, पर मेरे तो लोचन-चमत्कारके
लिये वही तत्त्व प्रस्फुरित हो, जो कालिन्दी-पुलिनमें
श्यामतेज रहता है—
ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं
ज्योतिः किञ्चन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते।
अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं
कालिन्दीपुलिनेषु यत्किमपि तन्नीलं महो धावति॥
किन्हीं भावुकोंने व्रजांगनाओंके पुंजीभूत प्रेमको
ही कृष्ण माना है, किन्हींने यदुओंके मूर्तीभूत भागधेयको
ही कृष्ण माना है, श्रोत्रियोंने श्रुतियोंके गुप्त वित्तको

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ) · पृष्ठ 589, कुल 778 में से · SarvaKosh