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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 586

५७६ भक्तिसुधा
होते तो इसका उत्तर यह है कि विश्वके उत्पादन-
पालनादि कर्म ईश्वरके भी होते हैं। फिर भी शंका
हो सकती है कि देहारम्भ-प्रयोजक कर्म ईश्वरके
नहीं हैं। किंतु इसके उत्तरमें कहा जा सकता है कि
कौन कर्म देहारम्भक है, कौन भोगारम्भक है, यह
बात शास्त्रैकगम्य है। फल-वैचित्र्यसे हेतु-वैचित्र्यका
अनुमान हो सकता है, परंतु किस कर्मसे कौन फल
होता है, इसका निर्णय अनुमानसे नहीं होता। जब
जीवोंके जन्मारम्भक कर्मोंको जाननेके लिये शास्त्रोंके
प्रामाण्यकी अपेक्षा है, जब शास्त्रप्रामाण्य मान्य है,
तब तो फिर प्राणिकल्याणार्थ अचिन्त्य, दिव्य
लीलाशक्तिसे ही प्रभुका दिव्य जन्म-कर्म हो ही
सकता है। इसपर किसीका कहना है कि मधुसूदन
स्वामीने माना है कि अवतार नहीं होता, किंतु भक्तकी
भावनासे ही विधुरपरिभावित-कामिनी-साक्षात्कारके
समान कृष्ण आदिका स्वरूप दिखलायी पड़ता है,
परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि—
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
(गीता ४।६)
'गीता' के इस मूल वचनसे अज, अव्यय
ईश्वरका मायाके द्वारा जन्म सिद्ध होता है और
मधुसूदन भी—
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥
—इस तरह श्रीकृष्णके विषयमें अपना अभिप्राय
प्रकट कर रहे हैं।
जहाँ भी कहीं आचार्योंने भगवान्‌के स्वरूपका
वर्णन किया है, वहाँ यही कहा है कि भगवान् वस्तुतः
अज, सर्वभूतान्तरात्मा होते हुए भी अपनी दिव्यलीला-
शक्तिसे देहवान् होकर प्रस्फुरित होते हैं। जैसे
घृतवर्तिकाके सम्बन्धसे निराकार अग्नि ही दाहकत्व,
प्रकाशकत्वविशिष्ट दीपशिखाके रूपमें अभिव्यक्त होती
है, वैसे ही निराकार भगवान् लीलाशक्तिके सम्बन्धसे
साकार होकर प्रतीत होते हैं। जैसे घृत-वर्तिकादि तटस्थ
रहकर ही दीपशिखाका कारण बनते हैं, दीपशिखाके
भीतर-बाहर शुद्ध अग्नि ही है, वैसे ही लीलाशक्ति
तटस्थ ही रहती है, भगवान्‌के स्वरूपमें भीतर, बाहर
शुद्ध चिदानन्द ही है, किंवा जैसे निर्मल जल ही
बर्फके रूपमें शैत्य-सम्बन्धसे प्रकट होता है, वैसे ही
अचिन्त्य, विशुद्ध सत्यके सम्बन्धसे सच्चिदानन्द ब्रह्म
साकार हो जाता है। जिस तरह सच्चिदानन्द ब्रह्म ही
अनिर्वचनीय मायाके आध्यासिक सम्बन्धसे नाम-रूप-
क्रियात्मक प्रपंचरूपसे प्रकट होता है, उसी तरह विशुद्ध
सत्त्वके आध्यासिक सम्बन्धसे ब्रह्म साकार देहधारी
हो जाता है। कम-से-कम आकाशादि प्रपंचके समान
तो अवश्य ही साकार ब्रह्मका अस्तित्व कट्टर-से-
कट्टर वेदान्तीको मान ही लेना चाहिये। वैसे तो बाध्यत्व,
मिथ्यात्व, अबाध्यत्व, सत्यत्वको लेकर चलें तो शुक्ति-
रूप्य आदिकी अपेक्षा अबाध्य घटादि कार्योंका सत्यत्व
है, मृत्तिकाकी अपेक्षा घटादिमें बाध्यता होनेसे मिथ्यात्व
है, तदपेक्षया मृत्तिकामें अबाध्यत्व होनेसे सत्यत्व है।
इसी तरह अपर जल, तेज, वायु, आकाश आदिमें
कार्यकी अपेक्षा कारणमें सत्यत्व और कारणकी अपेक्षा
कार्यमें मिथ्यात्व होता है। इस दृष्टिसे पारमार्थिक
सत्तापेक्षया किञ्चिन्न्यूनसत्ताकत्व ही उस दिव्य शक्तिका
व्यावहारिकत्व है। तथा च ब्रह्ममें पारमार्थिक दृष्टिसे
अजायमानता रहनेपर भी व्यावहारिक दृष्टिसे जायमानता
हो सकती है।

परमात्मामें पारमार्थिक सत्तासे जन्माभाव

और व्यावहारिक दृष्टिसे जन्मका भाव

समान सत्तावाले भाव-अभावका ही विरोध
होता है, विषम सत्तावाले भाव-अभावका विरोध
नहीं होता, अतएव वे दोनों एक जगह भी रह
सकते हैं। इसीलिये एक शुक्तिकामें व्यावहारिक
सत्तासे रूप्यका अभाव और प्रातिभासिक सत्तासे
रूप्यका भाव रहनेमें कोई भी विरोध नहीं है। इसी
दृष्टिसे परमात्मामें पारमार्थिक सत्तासे जन्माभाव और