भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामजन्म-रहस्य ५५५
निखिल ब्रह्माण्ड-मण्डल जिसके परतन्त्र है, वह
मायापति भगवान् भास्वती भगवती श्रीकृपादेवीके पराधीन
है और वे अनुकम्पा महारानी भी दीनताके परतन्त्र हैं।
भगवान्के यहाँ दोनोंकी खूब सुनवायी होती है।
जगद्विधेयं ससुरासुरं ते
भवान् विधेयो भगवत् कृपायाः।
सा दीनताया नमतां विधेया
ममास्त्ययत्नोपनतैव सेति॥
जो दीनता अन्यत्र अवहेलनाकी दृष्टिसे देखी
जाती है, वही भगवान्के यहाँ परमादरणीया है। शोक,
मोह, जरा, मरण, आधि-व्याधि, दारिद्र्य-दुःखोंसे
उत्पीड़ित प्राणियोंके यहाँ दीनताकी कमी नहीं है।
उसीका दुखड़ा सर्वत्र गाया जाता है, परंतु दुर्भाग्यवश
वह गाया जाता है ऐसी जगह, जहाँ कुछ मिलना-
जुलना तो दूर रहा, फूटे मुँहसे सहानुभूतिका भी एक
शब्द नहीं निकलता। वहाँ तो दीनको अवहेलनाओंका
ही पात्र बनना पड़ता है। परंतु 'दीनानाथ' होनेके नाते
भगवान् दीनताके ग्राहक हैं। उनके सामने दीनता प्रकट
करनेमें तो कृपणता न होनी चाहिये। जैसे संघर्षके
द्वारा व्यापक अग्निका सगुण-साकाररूपमें प्राकट्य
होता है, किंवा शैत्यके सम्बन्धसे जलका ओला हो
जाता है, वैसे ही प्रेमियोंके प्रेमप्राखर्यसे विशुद्ध
सत्त्वमयी श्रीकौसल्याम्बासे पूर्णतम पुरुषोत्तम-
भगवान्का प्राकट्य होता है। यज्ञपुरुषद्वारा समर्पित
चरुके ही विभागानुसार भगवान्का ही श्रीराम, लक्ष्मण,
भरत एवं शत्रुघ्नरूपमें आविर्भाव होता है।
भगवान्का आविर्भाव चार रूपोंमें
कुछ महानुभावोंका मत है कि सांगोपांग शेषशायी
भगवान्का आविर्भाव चार रूपमें होता है। साक्षात्
भगवान् श्रीरामरूपमें और शेष, शंख, चक्र-ये
लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्नरूपमें प्रकट होते हैं। आधे
अंशमें राम और आधेमें लक्ष्मण प्रभृति तीनों भ्राता।
दूसरे शब्दोंमें यह भी कहा जा सकता है कि सप्रपंच
ब्रह्मका भरतादि तीन रूपमें प्राकट्य हुआ और
निष्प्रपंच ब्रह्मका श्रीराम-रूपमें आविर्भाव हुआ।
प्रणवके 'अ' 'उ' 'म्' इन तीन मात्राओंके
वाच्य विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृतका शत्रुघ्न, लक्ष्मण
तथा भरत-रूपमें और अर्धमात्राका अर्थ तुरीयपाद
या वाच्यवाचकातीत, सर्वाधिष्ठान परमतत्त्वका श्रीराम-
रूपमें प्रादुर्भाव हुआ। निष्प्रपंच अर्धमात्राका अर्थ
तुरीय तत्त्व ही चरुके अर्ध अंशसे और शेष तीन
मात्राओंके अर्थ सप्रपंच तीनों तत्त्व चरुके अर्ध
अंशसे व्यक्त हुए हैं। प्रणवकी जैसे साढ़े तीन मात्रा
मानी गयी है, वैसे ही सोलह मात्रा भी मानी जाती
है। 'अकारो वै सर्वा वाक्।' समस्त वाक्योंका
अन्तर्भाव अकारमें ही होता है और समस्त वाक्योंका
आविर्भाव प्रणवसे ही होता है। अतः प्रणवमें ही
सोलह मात्राकी कल्पना करके उसके सोलह वाच्य
स्थिर किये गये हैं। जाग्रत्-अवस्थाका अभिमानी
व्यष्टि विश्व और समष्टि स्थूल प्रपंचका अभिमानी
विराट् होता है। सूक्ष्मप्रपंच और स्वप्नावस्थाका
अभिमानी तैजस और हिरण्यगर्भ एवं कारणप्रपंच,
सुषुप्ति-अवस्थाका अभिमानी प्राज्ञ और अव्याकृत
होता है। इन सभी कल्पनाओंका अधिष्ठान शुद्ध
ब्रह्म तुरीय तत्त्व होता है। फिर इन एक-एकमें भी
चार-चार भेद बतलाये गये हैं। जाग्रत्-अवस्थामें
स्पष्ट विषयबोध 'जाग्रत्-जाग्रत्' कहलाता है और
जाग्रत्-कालमें मनोराज्यादि करते समय 'जाग्रत्-
स्वप्न' कहा जाता है। शोक, मोह या हर्ष-
विशेषमें शून्यता या स्तब्धताके समय 'जाग्रत्-
सुषुप्ति' एवं जाग्रत्-कालमें ही निष्प्रपंच ब्रह्म-
दर्शन-कालमें 'जाग्रत्-तुरीय' कहा जाता है। इसी
तरह स्वप्नमें स्पष्ट व्यवहार 'स्वप्न-जागर', स्वप्नमें
स्वप्न 'स्वप्न-स्वप्न' और स्वप्नमें सुषुप्ति 'स्वप्न-
सुषुप्ति' और स्वाप्निक ब्रह्मानुभूति 'स्वप्न-तुरीय'
है। सुषुप्तिमें भी सात्त्विकी, राजसी और तामसी
भेदसे 'सुषुप्ति-जागर', 'सुषुप्ति-स्वप्न' और 'सुषुप्ति-
सुषुप्ति' होती है। निद्राके प्रभावसे विश्व-विस्मरण-
कालमें अभ्यासियोंको निष्प्रपंच ब्रह्म-दर्शन ही 'सुषुप्ति
तुरीय' है। स्थूल प्रपंचभासक सर्वानुस्यूत (ओत)