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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 561, कुल 778 में से

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पृष्ठ 561

शक्तिपीठ-रहस्य ५५१
तथा 'छकार' की उत्पत्ति हुई।
२४. त्रिवलियोंमेंसे प्रथम वलिका जहाँ निपात
हुआ, वहाँ मातुरेश्वरपीठ होकर 'जकार' की उत्पत्ति
हुई, वहाँ शैवमन्त्र शीघ्र सिद्ध होते हैं।
२५. अपर वलिके पतनस्थानमें अट्टहासपीठ
हुआ, 'झकार' का प्रादुर्भाव हुआ, वहाँ गणेश-
मन्त्रोंकी सिद्धि होती है।
२६. तीसरी वलिका जहाँ पतन हुआ, वहाँ
विरजपीठ हुआ और 'ञकार' की उत्पत्ति हुई। वह
पीठ विष्णु-मन्त्रोंका सिद्धिप्रदायक है।
२७. जहाँ बस्तिपात हुआ और 'टकार' की
उत्पत्ति हुई, वहाँ राजगृहपीठ हुआ। राजगृहमें
वेदार्थज्ञानकी प्राप्ति होती है। नीचे क्षुद्रघण्टिकाके
पतनस्थलमें घण्टिका नामक उपपीठ हुआ, वहाँ
ऐन्द्रजालिक मन्त्र सिद्ध होते हैं।
२८. नितम्बके पतनस्थलमें महापथपीठ हुआ
तथा 'ठकार' की उत्पत्ति हुई। जातिदुष्ट ब्राह्मणोंने वहाँ
शरीर अर्पित किया और दूसरे जन्ममें कलियुगमें देह-
सौख्यदायक वेदमार्ग-प्रलुप्तक अघोरादि मार्गको चलाया।
२९. जघनका जहाँ पात हुआ, वहाँ कौछगिरिपीठ
हुआ और 'डकार' की उत्पत्ति हुई। वन-देवताओंके
मन्त्रोंकी वहाँ सिद्धि शीघ्र होती है।
३०. दक्षिण ऊरुके पतनस्थलमें एलापुरपीठ
हुआ, 'ढकार' का प्रादुर्भाव हुआ।
३१. वाम ऊरुके पतनस्थानमें कालेश्वरपीठ
हुआ, 'णकार' की उत्पत्ति हुई, वहाँ आयुर्वृद्धिकारक
मृत्युंजयादि मन्त्र सिद्ध होते हैं।
३२. दक्षिण जानुके पतनस्थानमें जयन्तीपीठ
होकर 'तकार' की उत्पत्ति हुई, वहाँ धनुर्वेदकी सिद्धि
अवश्य होती है।
३३. वाम जानु जहाँ पतित हुआ, वहाँ
उज्जयिनीपीठ हुआ 'थकार' प्रकट हुआ, वहाँ
कवचमन्त्रोंकी सिद्धि होकर रक्षण होता है। अतः
उसका नाम 'अवन्ती' है।
३४. दक्षिण जंघाके पतनस्थानमें योगिनीपीठ
हुआ, 'दकार' की उत्पत्ति हुई। वहाँ कौलिक
मन्त्रोंकी सिद्धि होती है।
३५. वामजंघाके पतनस्थानपर क्षीरिकापीठ होकर
'धकार' का प्रादुर्भाव हुआ। वहाँ वैतालिक तथा
शाबर-मन्त्र सिद्ध होते हैं।
३६. दक्षिण गुल्फके पतनस्थानमें हस्तिनापुरपीठ
हुआ, 'नकार' की उत्पत्ति हुई। वहीं नूपुरका पतन
होनेसे नूपुरार्णवसंज्ञक उपपीठ हुआ, वहाँ सूर्य-
मन्त्रोंकी सिद्धि होती है।
३७. वामगुल्फके पतनस्थलमें उड्डीशपीठ होकर
'पकार' का प्रादुर्भाव हुआ। उड्डीशाख्य महातन्त्र
वहाँ सिद्ध होता है। जहाँ दूसरे नूपुरका पतन हुआ,
वहाँ डामर उपपीठ हुआ।
३८. देहरस (अस्थि)-के पतनस्थानमें प्रयागपीठ
हुआ, 'फकार' की उत्पत्ति हुई, वहाँ मृत्तिका
श्वेतवर्णकी दृष्टिगोचर होती है। वहाँ अन्यान्य
अस्थियोंका पतन होनेसे अनेक उपपीठोंका प्रादुर्भाव
हुआ। गंगाके पूर्वमें बगलोपपीठ एवं उत्तरमें चामुण्डादि
उपपीठ, गंगा-यमुनाके मध्यमें राजराजेश्वरीसंज्ञक,
यमुनाके दक्षिण तटपर भुवनेशी नामक उपपीठ हुआ।
इसीलिये प्रयाग तीर्थराज एवं पीठराज कहा गया है।
३९. दक्षिण पृश्निके पतन-स्थानमें षष्ठीशपीठ
हुआ एवं 'बकार' का प्रादुर्भाव हुआ। यहाँ पादुका-
मन्त्रकी सिद्धि होती है।
४०. वाम पृश्निका जहाँ पात हुआ, वहाँ
मायापुरपीठ हुआ, 'भकार' की उत्पत्ति हुई, समस्त
मायाओंकी सिद्धि वहाँ होती है।
४१. रक्तके पतनस्थानमें मलयपीठ हुआ एवं
'मकार' की उत्पत्ति हुई। रक्ताम्बरादि बौद्धोंके मन्त्र
यहाँ सिद्ध होते हैं।
४२. पित्तकी पतनभूमिपर श्रीशैलपीठ हुआ तथा
'यकार' का प्रादुर्भाव हुआ। विशेषतः वैष्णव-मन्त्र
यहाँ सिद्ध होते हैं।
४३. मेदके पतनस्थानमें हिमालयपर मेरुपीठ
हुआ एवं 'रकार' की उत्पत्ति हुई। स्वर्णाकर्षण