भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्तिपीठ-रहस्य ५४९
दक्षके यहाँ जन्म लेकर जब अपने दिव्यरूपसे
शंकरको मोहित करूँगी, तभी सृष्टि ठीक चलेगी।'
यह कहकर देवीने दक्षके यहाँ जाकर उन्हें वर दिया
और उनके यहाँ सतीरूपसे प्रकट हुईं। किंचित् बड़ी
होते ही वे शिवप्राप्तिके लिये तप करनेमें लग गयीं।
इतनेमें ही ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओैंने जाकर
शंकरकी स्तुति की और उन्हें विवाहके लिये राजी
किया। उधर सतीकी आराधनासे शंकर प्रसन्न हुए
और उन्हें वरदान दिया कि 'हम तुम्हारे पति होंगे।'
फिर उनका सानन्द विवाह सम्पन्न हुआ और सहस्रों
वर्षोंतक सती और शिवका श्रृंगार हुआ। उधर दक्षके
यज्ञमें शिवका निमन्त्रण न होनेसे और उनका अपमान
जानकर सतीने उस देहको त्यागकर हिमवत्पुत्री
पार्वती होकर शिवपत्नी होनेका निश्चय किया और
योगबलसे देह त्याग दिया। शिवजीको समाचार
विदित होनेपर बड़ा क्षोभ और मोह हुआ और
दक्षयज्ञको नष्ट करके सतीके शवको लेकर शिवजी
घूमते रहे। सम्पूर्ण देवताओंने या सर्वदेवमय विष्णुने
शिवमोहशान्ति एवं साधकोंके सिद्धि आदि कल्याणके
लिये शवके भिन्न-भिन्न अंगोंको भिन्न-भिन्न स्थलोंमें
गिरा दिया, वे ही ५१ पीठ हुए।
हृदयसे ऊर्ध्वभागके अंग जहाँ पतित हुए, वहाँ
वैदिक एवं दक्षिण मार्गकी सिद्धि होती है और
हृदयसे निम्नभागके अंगोंके पतनस्थलोंमें वाममार्गकी
सिद्धि होती है।
इक्यावन शक्तिपीठ
सतीके विभिन्न अंग कहाँ-कहाँ गिरे और उनसे
कौन-कौन-से पीठ बने, इसका विवरण इस प्रकार है—
१. सतीकी योनिका जहाँ पात हुआ, वहाँ
कामरूप नामक पीठ हुआ, वह 'अकार' का उत्पत्तिस्थान
एवं श्रीविद्यासे अधिष्ठित है। यहाँ कौलशास्त्रसे
अणिमादि सिद्धियाँ सिद्ध होती हैं। लोमसे उत्पन्न
इसके वंश नामक दो उपपीठ हैं, वहाँ शाबर-मन्त्रोंकी
सिद्धि होती है।
२. स्तनोंके पतनस्थलमें काशिकापीठ हुआ और
वहाँसे 'आकार' उत्पन्न हुआ। वहाँ देहत्याग करनेसे
मुक्ति प्राप्त होती है। सतीके स्तनोंसे दो धाराएँ
निकलीं, वही असी और वरणा नदी हुई। असीके
तीरपर दक्षिण सारनाथ उपपीठ है एवं वरुणाके
उत्तरमें उत्तर सारनाथ उपपीठ है, वहाँ क्रमशः दक्षिण
एवं उत्तर मार्गके मन्त्रोंकी सिद्धि होती है।
३. गुह्यभाग जहाँ पतित हुआ, वहाँ नेपालपीठ
हुआ, वहाँसे 'इकार' की उत्पत्ति हुई। वह पीठ
वाममार्गका मूलस्थान है। वहाँ ५६ लाख भैरव-
भैरवी, दो हजार शक्तियाँ, तीन सौ पीठ एवं चौदह
श्मशान सन्निहित हैं। वहाँ चार पीठ दक्षिणमार्गके
सिद्धिदायक हैं, उनमें भी चारमें वैदिक मन्त्र सिद्ध
होते हैं। नेपालसे पूर्वमें मलका पतन हुआ, अतः वहाँ
किरातोंका निवास है। तीस हजार देवयोनियोंका वहाँ
निवास है।
४. वाम नेत्रका पतनस्थान रौद्रपर्वत है, वह
महत्पीठ हुआ, 'ईकार' की उत्पति वहाँसे हुई।
वामाचारसे वहाँ मन्त्रसिद्धि होकर देवताका दर्शन
होता है।
५. वाम कर्णके पतनस्थानमें काश्मीरपीठ हुआ,
वह 'उकार' का उत्पत्तिस्थान है। वहाँ सर्वविध
मन्त्रोंकी सिद्धि होती है। वहाँ अनेक अद्भुत तीर्थ हैं,
किंतु कलिमें सब म्लेच्छोंद्वारा आवृत कर दिये
जायेंगे।
६. दक्षिण कर्णके पातस्थलमें कान्यकुब्जपीठ
हुआ और 'ऊकार' की उत्पत्ति हुई। जहाँ गंगा-
यमुनाके मध्यमें अन्तर्वेदी नामक पवित्र स्थलमें
ब्रह्मादि देवोंने स्व-स्वतीर्थोंका निर्माण किया है। वहाँ
वैदिक मन्त्रोंकी सिद्धि होती है। उस कर्णके मलके
पतनस्थानमें यमुनातटपर इन्द्रप्रस्थ नामक उपपीठ
हुआ, उसके प्रभावसे ब्रह्माजीको विस्मृत वेद वहाँ
पुनः उपलब्ध हुए।
७. नासिकाके पतनस्थानमें पूर्णगिरिपीठ है, वह
'ऋकार' का उत्पत्तिस्थल है। वहाँ योगसिद्धि होती
है और मन्त्राधिष्ठातृदेव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं।