भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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गलता हुआ-सा, रसनासे आकृष्ट हुआ-सा विमूढधी
होकर प्राणी कितना विवश होता है ? जलावर्तमें तथा
पर्जन्यमें, मारुतमें, अनन्त गगनमें, कभी समुद्रमें, कभी
पृथ्वीमें गिरता हुआ-सा मोह, मूर्च्छा, वेदनाओंका
अनुभव करता है। जब भीषण व्यथासे नाड़ियोंकी
स्वाभाविक गति बदल जाती है, भीतर प्रविष्ट वायु
बाहर नहीं आता, बाहरका वायु भीतर नहीं जाता,
उसी समय संज्ञाविनाशरूप, अतिविस्मृतिस्वरूप मृत्युका
व्यवहार होता है। वस्तुतः इस समय भी स्वप्रकाश
चेतन आत्मा ज्यों-का-त्यों अक्षुण्ण ही रहता है।
दृश्यके अत्यन्तासम्भवकी भावनासे दृश्य वासना क्षीण
होती है। किसी हेतुसे अत्यन्त विस्मृति ही जन्तुकी
मृत्यु है और स्वप्न एवं माया मनोरथके समान
सर्वभावसे विषय-स्वीकार ही जन्म है—
जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः ॥
जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद।
विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथः ॥
(श्रीमद्भा० ११।२२।३८-३९)
माँ ! जगदाधारस्वरूपे ! स्थूल, सूक्ष्म, कारणरूप
त्रिविध शरीर ही आपका पुर है, इसलिये आप
सर्वसाक्षिणी त्रिपुरा हैं। माँ ! कितने ही प्राणी मृत्युके
अनन्तर पाषाणहृदयके तुल्य अति जड़ताको प्राप्त
होकर बहुत समयतक रहते हैं। वासनावशात् पुनः
विविध नरकदुःखोंका अनुभव करके सहस्रों योनियोंमें
भटककर, विविध दुःखोंको भोगकर पुनः क्वचित्
शमको प्राप्त कर पाते हैं। वस्तुतस्तु सब कुछ
हृदयस्थ विचारमात्र ही है। जैसे स्वप्नद्रष्टाके कर्मों
और वासनाओंसे संवलित विचार ही घनीभूत होकर
वज्रसारतुल्य स्वाप्निक प्रपंचरूपमें प्रकट होते हैं, वैसे
ही क्षणमें दुःखशताकुल वृक्षलतादिको प्राप्त होता है।
वासनाके अनुरूप ही नरकादि तथा विविध योनिके
जन्मोंका भी अनुभव होता है। भावनानुसार ही कोई
स्वर्गसुख एवं ब्रह्मलोक-सुखका अनुभव करते हैं।
कुछ लोग वासनावशात् ही यह भी अनुभव करते हैं
कि यमभटोंसे यमपुरके लिये ले जाये जा रहे हैं,
मार्गमें विविध उद्यानों, शोभन विमानोंका अनुभव
करते हैं। कभी-कभी स्वकर्मवश प्राप्त हिमानी-
कण्टक, श्वभ्र शस्त्रपात आदिका अनुभव करते हैं।
कहीं स्निग्धछाया तथा वापीसंयुक्त स्थान प्राप्त होता
है। यमपुरमें जाकर यमका दर्शन, शुभाशुभ कर्मोंका
विचार, तदनुकूल स्वर्ग-नरकादि भोग, पुनः
पंचाग्निविद्याक्रमेण शालिव्रीहि-यवादिभावकी प्राप्ति,
शुक्रादि-परिणति, रत्यादिद्वारा गर्भस्थिति, गर्भवृद्धि
आदि क्रमेण बालक-जन्म, पुनश्च क्रमेण तारुण्य,
जरादिकी अनुभूति होती है।
सर्गादिमें शैल, द्रुम, पृथ्वी आदि सब कुछ
तत्पदार्थ परमेश्वरमें ही अध्यस्त होते हैं। अनावृत
चैतन्यद्वारा सत्त्वत्वेन असत्य वस्तुओंका प्रतिभास
होता है। ईश्वर सर्वज्ञ है, अतः उसे सर्वार्थका
प्रतिभास होता है। स्वरूपसे अप्रच्युतमें ही जगदध्यास
उपपन्न होता है। जैसे स्वप्नद्रष्टाके द्वारा अनेक
चेतनाचेतन प्रपंचकी सृष्टि प्रतीत होती है, वहाँ
स्वप्नद्रष्टासे भिन्न कुछ भी नहीं है, ठीक वैसे ही
अखण्ड भानसे भिन्न होकर चेनताचेतन दृश्य कुछ
भी नहीं है। पाषाण, पारदादिमें साभास अन्तःकरण
उद्भूत नहीं है, अतः वे अचेतन कहलाते हैं। नर,
तिर्यगादिमें साभास अन्तःकरण विकसित होते हैं,
अतः वे चेतन कहलाते हैं।
हे माँ ! 'योगवासिष्ठ' में ज्ञप्तिस्वरूपसे जो
आपने समझाया था कि आतिवाहिक प्रपंच ही
आधिभौतिक रूपसे प्रतीत होता है, गम्भीरतासे विचारनेपर
बात ठीक वैसी ही प्रतीत होती है। आधिभौतिक
प्रपंचकी गुरुता, कठिनता आदि समाप्त हो जाते हैं,
जब उसकी आतिवाहिकताका बोध होता है। जैसे
स्वप्नमें उपलब्ध प्रपंचकी दुर्भेद्यताका द्रष्टा तभीतक
अनुभव करता है, जबतक प्रबोध नहीं होता। प्रबोध
होते ही स्वप्नका कारागार, स्वप्नके दुर्भेद्य निगड़ादि
बन्धन न जाने कहाँ चले जाते हैं। उनकी कठोरता,
उनका अस्तित्व कहाँसे आया था और कहाँ चला
गया, यह कहना कठिन है। सब कुछ संकल्पका ही