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सर्वकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 778 में से

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पृष्ठ 522

५१२ भक्तिसुधा
ब्राह्मी, कामधेनु, वेदगर्भा, धीश्वरी नाम और नामानुरूप
ही कर्म बतलाये गये हैं। महालक्ष्मी स्वयं ही
साम्यावस्थाकी अभिमानिनी होते हुए रजोगुणकी भी
अभिमानिनी हुईं, अतएव महालक्ष्मीका रक्त-रूप वर्णन
मिलता है। अन्तमें महालक्ष्मीने महाकाली और
महासरस्वतीसे कहा कि—‘आप दोनों अपने अनुरूप
स्त्री-पुरुषरूप मिथुन उत्पन्न करो।'
ऐसा कहकर स्वयं महालक्ष्मीने निर्मल ज्ञानमय
कमलपर विराजमान एक स्त्री एवं एक पुरुषका
मिथुन बनाया। ब्रह्मा, धाता आदि पुरुषके नाम तथा
श्री, पद्मा, कमला, लक्ष्मी आदि स्त्रीके नाम हुए।
महाकालीने भी एक मिथुन बनाया, उसमें नीलकण्ठ,
रक्तबाहु, श्वेतांग, चन्द्रशेखर पुरुष हुआ और शुक्ल
वर्णकी ही सुन्दरी स्त्री हुई। पुरुषके रुद्र, शंकर,
स्थाणु, कपर्दी, त्रिलोचन नाम हुए; स्त्रीके त्रयी,
विद्या, कामधेनु, भाषा, अक्षरा, स्वरा आदि नाम हुए।
सरस्वतीसे भी उत्पन्न मिथुनमें विष्णु, हृषीकेश,
वासुदेव, जनार्दन पुरुषके और उमा, गौरी, सती,
चण्डी, सुन्दरी, सुभगा, शिवा स्त्रीके नाम हुए। इस
तरह बिना पुरुषके ही युवतियाँ ही पुरुष बन गयीं।
साधारण लोग इसे असम्भव समझते हैं, परंतु
अचिन्त्य मायाशक्तिकी महिमा जाननेवालोंके लिये
यह असम्भव नहीं। महालक्ष्मीने ब्रह्माका सरस्वतीसे,
रुद्रका गौरीसे, वासुदेवका लक्ष्मीसे विवाह कर दिया।
ब्रह्माने सरस्वतीके साथ ब्रह्माण्ड बनाया, रुद्रने गौरीके
साथ संहारका काम किया और विष्णुने लक्ष्मीके साथ
पालन किया। ब्रह्मदृष्टिसे चैतन्यरूपा सरस्वती, सत्तारूपी
लक्ष्मी, आनन्दरूपा काली हैं, अतः चैतन्यका
अभिव्यंजक सत्त्व सत्ताव्यंजक रज और आनन्दव्यंजक
तम है। सुषुप्तिमें तमकी बहुलतासे आनन्दमयकी
व्यक्ति होती है। सत्त्वोत्कर्षसुलभ प्रिय, मोद और
प्रमोदरूप फलात्मक आनन्दमयका सुषुप्तिमें पर्यवसान
तमोरूपा निद्रामें होता है, इसलिये रुद्रमें तमका
व्यवहार होता है। सत्ताव्यंजक रजका पर्यवसान
सत्त्वात्मक ज्ञानमें होता है, इसलिये विष्णुको सत्त्व
कहा है। चैतन्यव्यंजक रज अपने रूपमें रहता है,
इसलिये ब्रह्मामें कहा जाता है। इतिहासकी दृष्टिसे
पहले उत्पत्ति, फिर स्थिति, फिर संहार होता है।
साधनामें संहार, पालन और उत्पादन यह क्रम मान्य
होता है। स्थितिकालमें भी उन्नतिके लिये तीनों
शक्तियोंकी अपेक्षा है। दोषोंका संहार, रक्षणीय
गुणोंका पालन और फिर अविद्यमान गुणादिकोंका
उत्पादन अभीष्ट होता है। रोगोंका नाश, प्राणोंका
रक्षण और बलका उत्पादन यह शिव, विष्णु एवं
ब्रह्माका काम है। वैसे ये सब-के-सब विशुद्ध
सत्त्वमय हैं, इसलिये शैवपुराणोंमें शिवको भी सत्त्वमय
कहा गया है। शैव, वैष्णव, शाक्त सबके यहाँ अपने
इष्टदेवको ही मूलतत्त्व माना जाता है। मूलतत्त्वमें ही
पूर्ण सर्वज्ञता आदिकी विवक्षासे सत्त्वमय कहा जाता
है। गुणकृत आवरण एवं तत्प्रभावसे रहित होनेके
कारण उसे ही निर्गुण भी कहा जाता है।
जिस तरह मेघादि सूर्यके आवरक होते हैं,
उपनेत्रादि नहीं; उसी तरह अस्वच्छ उपाधि
सच्चिदानन्दकी आवरक होती है, स्वच्छ नहीं।
इसीलिये शिवकी शक्ति कालीसे संहार होता है।
केवल प्रकाशमें सृष्टि नहीं हो सकती, इसीलिये
सरस्वतीको रजके अधिष्ठाता ब्रह्माका सहारा लेना
पड़ता है। रजसे कार्य बनता चलता है, परंतु यदि
उसमें टिकाव न हो, तो पालन नहीं बन सकता, अतः
कार्यको टिकाऊ या स्थिर करनेके लिये लक्ष्मीको
तमोऽधिष्ठाता विष्णुकी अपेक्षा होती है। तमके
प्राबल्यमें अत्यन्त रुकावट होनेपर पालन न होकर
संहार होता है। परंतु संहारमें भी किसका, कब,
कितने दिनतक संहार हो, इसके ज्ञानके लिये सत्त्वकी
अपेक्षा है, इसीलिये काली शिवका सहारा लेती हैं।
अन्यथा ब्रह्माको रज, रुद्रको तम और विष्णुको
सत्त्वका अधिष्ठाता कहा जाता है। ब्रह्माका रंग तो
उनके गुण रजके अनुसार रक्त है; परंतु शिव, विष्णुमें
यह नहीं घटता। सत्त्वगुणके अनुसार शिव शुक्ल और
तमके अनुसार विष्णु कृष्ण हैं।